अगर आपको कृषि का गहराई से ज्ञान हो, तो यह न सिर्फ इसे अलग बनाता है, बल्कि ज्यादा फायदेमंद व्यापार भी बनाता है

Management Funda by N. Raghuraman

कुछ साल पहले मप्र के रतलाम में मेरे सहकर्मी विनोद सिंह ने मुझे अनोखा उपहार दिया था। उन्होंने मुझे असली हींग की पुड़िया दी थी, शायद करीब 10 ग्राम की। लेकिन मेरे भोपाल पहुंचने से पहले मेरी पूरी कार न सिर्फ हींग की खुशबू से भर गई, बल्कि मेरा सिर दर्द होने लगा। तब मुझे अहसास हुआ कि हमारे किचन में अक्सर जलन, अपच और कब्ज के घरेलू उपचार में इस्तेमाल होने वाली और आयुर्वेद के अनुसार तीनों दोषों को संतुलित करने वाली हींग को बेचने के लिए उसमें आटा और गम अरेबिक मिलाया जाता है, ताकि उसका तेज स्वाद सामान्य किया जा सके।

पर मुझे यह नहीं पता था कि हम भारतीय जो हींग इस्तेमाल करते हैं, वह आयात होती है। हमारा देश हर साल अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान से करीब 1,540 टन हींग आयात करता है और उसपर करीब 942 करोड़ रुपए खर्च करता है। किसी ने भी हींग के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के बारे में नहीं सोचा, जो हमारे भारतीय व्यंजनों और प्राकृतिक औषधि का अभिन्न हिस्सा रही है। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय शाकाहारी व्यंजनों को स्वाद देने वाले और पाचन समस्याओं का घरेलू इलाज करने वाले इस मसाले के पीछे जो पेड़ है, वह इस 15 अक्टूबर से पहले भारत में कभी लगाया ही नहीं गया।

यही कारण है कि फूड ट्रेंड पर नजर रखने वालों में उत्साह की लहर दिखी, जब हाल ही में पालमपुर, हिमाचल प्रदेश स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर)- इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोसोर्स टेक्नोलॉजी (आईएचबीटी) ने घोषणा की कि उन्होंने फेरुला हींग के 800 पौधे लगाए हैं। सीएसआईआर-आईएचबीटी के निदेशक डॉ संजय कुमार ने फेरुला का पहला बीज 15 अक्टूबर को हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी के क्वारिंग गांव में लगाया। ठंडे रेगिस्तानी इलाके में चल रहे इस ट्रायल प्रोजेक्ट की टीम में वैज्ञानिक अशोर कुमार, रमेश और सनतसुजात सिंह शामिल हैं। भारत में लाहौल और स्पिति तथा अरुणाचल प्रदेश व उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में ऐसे ठंडे रेगिस्तानी इलाके हैं, जो फेरुला की खेती के लिए उपयुक्त हैं।

खाने की संस्कृति में ऐसी चीजें देख मैंने ऐसे युवाओं को तलाशा जो कृषि जैसे बेहद आम क्षेत्र में कुछ अलग कर रहे हैं। और मुझे 44 वर्षीय विनोद वेणुगोपाल के बारे में पता चला, जो एक मल्टीनेशनल मेडीकल कंपनी में काम करते थे और तिरुवनंतपुरम के मालायम में अपने डेढ़ एकड़ के रबर के बागान से ठीक-ठाक कमाई कर रहे थे। चूंकि मिट्‌टी उपजाऊ थी इसलिए वे उसका बेहतर इस्तेमाल करना चाहते थे। उन्होंने सोशल नेटवर्किंग पेज पर संदेश पोस्ट कर उनके साथ खेती करने के इच्छुक लोगों को आमंत्रित किया। रुचि दिखाने वाले ज्यादातर लोग पैसा निवेश करना चाहते थे। लेकिन विनोद पैसे नहीं चाहिए थे। वे ऐसे लोगों से जुड़ना चाहते थे जो अपना समय और श्रम दे सकें। फिर उन्होंने खेती को लेकर उत्साहित अनु जोसेफ और फिलिप चाको को बिजनेस सहयोगी चुना।

उन्होंने दिसंबर 2019 में सेंट्रल ट्यूबर क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट से टैपिओका के 2200 पौधे लेकर लगाए। सिंतबर में उनकी करीब 10 हजार किग्रा की फसल हुई। टैपिओका ज्यादातर उद्योगों में इस्तेमाल होता है। अब उनके खेत में टैपिओका के साथ काजू, मिर्च , हमिंगबर्ड ट्री, सहजन, कड़ी पत्ता और सुपाड़ी समेत कई फसलें लगी हैं। उन्होंने वे फसलें चुनी हैं, जिनपर रोज ध्यान नहीं देना पड़ता और वे अपनी बाहरी नौकरी भी कर सकते हैं। इसीलिए वे सब्जियां उगाने के इच्छुक नहीं हैं। टीम अब दुर्लभ पौधे लगाने का सोच रही है और उन्होंने पहले ही मलेशियन नींबू लगा दिए हैं, जो बिना बीज वाले नीबू हैं, जिनकी अच्छी कीमत मिलती है।

फंडा यह है कि अगर आपको कृषि का गहराई से ज्ञान हो, तो यह न सिर्फ इसे अलग बनाता है, बल्कि ज्यादा फायदेमंद व्यापार भी बनाता है।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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