अगर आप कुशल व्यक्ति हैं या छोटे व्यापार मालिक हैं और निष्क्रिय महसूस कर रहे हैं, तो उछाल पाने के लिए आप तकनीक के बल पर छलांग लगाएं

Management Funda by N. Raghuraman

त्योहार का यह मौसम व्यापार समुदाय के लिए खुशियां लाया है, जो मार्च के बाद से महामारी के कारण हुए नुकसान की कुछ भरपाई कर पाए हैं। जहां व्यापार समुदाय ने राहत की सांस ली है, लॉकडाउन के बाद से आपका और मेरा मन अब भी स्ट्रीट फूड के लिए ललचा रहा है। हमें हमारी ‘खाऊ गली’ के गोल गप्पा, छोले पुरी, मसाला डोसा आदि व्यंजनों की बहुत याद आती है।

मुझे ऐसे रचनात्मक नाम भी याद आते हैं, जो सिर्फ खाऊ गली के ठेले दे सकते हैं। जैसे ‘मसाला बाहर डोसा’। अगर आप सोच रहे हैं कि इसका संबंध वादियों या बहार से है, तो आप गलत हैं। यह ऐसा व्यंजन है, जिसमें मसाला, डोसे के बाहर रहता है और आप तब तक प्लेन डोसा ऑर्डर कर सकते हैं, जब तक मसाला खत्म नहीं हो जाता! ऐसे अनोखे नाम और आइडिया इन ठेले वालों से ही आ सकते हैं, हालांकि कुछ बड़े संस्थान भी ऐसी कोशिश करते रहते हैं।

ये बिजनेस महामारी में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, स्वाभाविक है, उनकी साफ-सफाई के मानकों की वजह से। लेकिन अब वे नए अवतार में आ रहे हैं। वे अब बस एक क्लिक की दूरी पर होंगे। प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि स्कीम के तहत, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई), राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन और एक फूड एप के सहयोग से कॉर्पोरेशन 500 स्ट्रीट वेंडर्स (ठेले/गुमटी वाले) को खाद्य सुरक्षा और साफ-सफाई से जुड़ा प्रशिक्षण देगा, जिसके बाद उन्हें एफएसएसएआई की तरफ से सर्टिफिकेशन दिया जाएगा।

यह स्ट्रीट वेंडर्स के लिए कोविड-19 राहत कार्य का हिस्सा है। उन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ने पर वे अपने बिजनेस को अलग स्तर पर ले जा पाएंगे। वेंडर फिर फूड डिलेवरी एप कंपनियों के साथ जुड़ने की प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे, जहां उन्हें काम के तकनीकी पहलुओं से अवगत कराया जाएगा। शुरुआत के लिए चेन्नई में 25 नवंबर से 50 प्रशिक्षित वेंडर्स ऑनलाइन जुड़ जाएंगे। अब विभिन्न नगरीय निकाय ऐसी पहल कर रहे हैं, जिससे मिशन कई शहरों में पहुंच रहा है। जल्द ही कई स्ट्रीट वेंडर मास्क, ग्लव्स और हेड कैप पहनकर ऑनलाइन ऑर्डर के साथ ठेले पर भी नजर आएंगे।

केवल व्यापार मालिक ही नहीं, महामारी के बाद कई लोग व्यक्तिगत स्तर पर तकनीक अपना रहे हैं। हरीश आर नंबूथिरिपडू का उदाहरण लें। वे केरल के कक्कूर में रामामंगलम हाई स्कूल में अपर-प्राइमरी शिक्षक हैं। वे ऑडियो क्लिप्स के माध्यम से बच्चों को मलयालम में नैतिक शिक्षा की दिल को छूने वाली लघु कथाएं और परीकथाएं सुना रहे हैं। वे ये कथाएं मार्च में लॉकडाउन के बाद से वॉट्सएप पर रोज साझा कर रहे हैं। पिछले 7 महीनों में ये 46 वर्षीय शिक्षक अपनी लिखी 150 से ज्यादा कहानियां सुना चुके हैं।

उनकी कहानियां केरल से लेकर विदेश तक 200 वॉट्सएप ग्रुप में शेयर की जा रही हैं, जहां उनकी ऑडियो क्लिप्स बच्चों को सोते समय सुनाने वाली कहानियां बन गई हैं। करीब तीन दशक में बच्चों की 39 किताबें लिख चुके हरीश ने अपनी कहानियों में एक काल्पनिक भूत ‘मैक्रॉनी’ भी बनाया है, जो बच्चों को कोविड-19 और निजी स्वच्छता के बारे में जागरूक करता है। उनका खुद का कहानियों का भंडार खत्म होने वाला है और अब वे कहानियों को और रोचक बनाने के लिए लाइवस्ट्रीम/वीडियो रिकॉर्डिंग की योजना बना रहे हैं।

फंडा यह है कि अगर आप कुशल व्यक्ति हैं या छोटे व्यापार मालिक हैं और निष्क्रिय महसूस कर रहे हैं, तो मेरी सलाह है कि उछाल पाने के लिए आप तकनीक के बल पर छलांग लगाएं।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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