अगर आप चाहते हैं कि बच्चों का ‘ई-क्लास’ में एक घंटे तक ध्यान न भटके, तो शुरुआत के 5-7 मिनट ‘शुगर क्लास’ पर खर्च करें

वह पांचवीं कक्षा में है और महज 11 साल की है, पुणे में रहती है। चूंकि कोविड के कारण स्कूल में कक्षाएं नहीं लग रही थीं, इसलिए वह माता-पिता के साथ महाराष्ट्र के भिवंडी में भोकारी गांव स्थित उनके गन्नों के खेत चली गई। उसने जब 14 एकड़ में फैले खेत में दिनभर प्रवासी कामगार माता-पिताओं के साथ घूमते बच्चों के साथ काम शुरू किया तो उसे एहसास हुआ कि वे आधारभूत स्कूली शिक्षा से वंचित हैं क्योंकि उनका परिवार आजीविका के लिए घूमता रहता है।

मिलिए दिविजा दारेकर से, जिसने अपनी अच्छी दोस्त, नौंवी कक्षा में पढ़ने वाली, पुणे की ही 14 वर्षीय सेजल पवार के साथ आधारभूत कक्षाएं लेना शुरू किया है, जहां वे बच्चों को अल्फाबेट, नंबर और क्राफ्ट पढ़ाती हैं। अपने कई पाठों में, इन दोनों ने हर छात्र से खुद का परिचय देने कहा और उनका पसंदीदा पेशा पूछा, जिसके वे सपने देखते हैं। कोई छात्र पुलिसवाला बनाना चाहता है, कोई डॉक्टर। यानी उनके सपने हैं, पर वे दिशाहीन हैं। और दिविजा और सेजल ने उन्हें दिशा देने के लिए सामाजिक कार्य का फैसला लिया और अपनी कक्षा का नाम ‘शकर शाला’ बिल्कुल उपयुक्त रखा। दिलचस्प यह है कि इस ‘शुगर क्लास’ के छात्र यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें रोज पढ़ाया जाए। यह कक्षा सोशल मीडिया पर और राजनेताओं के बीच भी मशहूर हो रही है।

मेरे हिसाब से यह कक्षा मार्केटिंग के दृष्टिकोण से तैयार नहीं की गई, बल्कि यह इसलिए मशहूर हुई क्योंकि इन दो स्कूली बच्चियों ने प्रवासी मजदूरों को ऐसे हैरान करने वाले तथ्य और आंकड़े बताए, जिनके बारे में ये बच्चे जागरूक नहीं थे। कुलमिलाकर अनजान क्षेत्र की शक्कर में डूबी जानकारी के साथ सैद्धांतिक पाठ से कमाल हो सकता है।

इस हफ्ते सोमवार और मंगलवार को मेरी मध्य प्रदेश के कई शिक्षकों के साथ मीटिंग की शृंखला थी और सभी का साझा सवाल था कि ई-क्लास में बच्चों का ध्यान कैसे लगाएं, जहां छात्र न सिर्फ अपना कैमरा, बल्कि अपना दिमाग भी बंद कर लेते हैं और उनकी उपस्थिति की निगरानी करना भी मुश्किल है, जैसा आमने-सामने वाली कक्षाओं में कर पाते थे।

अगर आप उन शिक्षकों और माता-पिताओं में से एक हैं, जिन्होंने बहुत से बच्चों को क्लास के दौरान हर तरह से ‘स्विच ऑफ’ करते देखा है, तो समय आ गया है कि हम पढ़ाने और पैरेंटिंग की बेहद अनुशासन वाली शैली छोड़ दें। कोविड के हमले के बाद, ‘डिजिटली निर्भर’ बच्चे चाहते हैं कि हम उन्हें चौंकाएं। जब भी मैं ई-क्लास में एमबीए छात्रों से पहली बार बात करता हूं तो एक क्विज प्रोग्राम खेलता हूं, ‘कौन बनाएगा दिमाग का दही’। इसमें सिर्फ पांच सवाल होते हैं और दो मिनट से ज्यादा वक्त नहीं लगता। हर जवाब झट से देना होता है।

मेरा पहला सवाल है, ‘दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश कौन-सा है?’ स्वाभाविक है कि मुझे तुरंत चीन जवाब मिल जाता है। जब मैं तुरंत पूछता हूं कि दूसरा कौन है, छात्र तुरंत चीखते हैं, ‘भारत’। लेकिन जब मैं तीसरा देश पूछता हूं तो 98% छात्र चुप हो जाते हैं और वे अमेरिका नहीं कह पाते। उसके बाद सभी जवाब गलत होंगे और मैं तेजी से पूछता रहूंगा और जवाब भी देता रहूंगा ताकि उन्हें किसी दूसरे डिवाइस पर गूगल करने का मौका न मिले।

फिर मैं सबसे ज्यादा आबादी वाले शीर्ष 10 देश उनकी प्रतिशत में हिस्सेदारी के साथ साझा करता है। जैसे चीन का 19.4%, भारत 17.5% और अमेरिका 4.5%। फिर मैं उन्हें बताता हूं कि अगर वे मेरी कक्षा में ध्यान देंगे तो उनकी हर क्षेत्र में गहरी जानकारी बढ़ेगी।

फंडा यह है कि अगर आप चाहते हैं कि बच्चों का ‘ई-क्लास’ में एक घंटे तक ध्यान न भटके, तो शुरुआत के 5-7 मिनट ‘शुगर क्लास’ पर खर्च करें।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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