अगर आप लोगों की जिंदगी आसान बनाने को तैयार हैं, तो हमेशा एक कामयाब बिजनेस का अवसर मौजूद है

आभासी रूप से हम लगभग रोज ही खाना पकाते समय रसोई में उनसे मिलते हैं। जी हां, सब्जी से लेकर राजमा, शाही पनीर, दाल मखानी तक, हम जो भी व्यंजन पकाएं, उसके लिए हम रसोई की अलमारी से एक छोटा-सा पैकेट निकालते हैं। मसालों के पैकेट पर शानदार लाल पगड़ी और सफेद शेरवानी पहने हुए, चश्मेवाले ‘दादाजी’ की मुस्कुराती हुई छवि यह सुनिश्चित करती है कि यह मसाला हर व्यजंन में बेहतरीन स्वाद, खुशबू और रंगत डाल देगा।

मैं बात कर रहा हूं महाशियां दी हट्‌टी (एमडीएच नाम से मशहूर) के मालिक धर्मपाल गुलाटी की, जिनका 98 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से गुरुवार को दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया, जहां उनका इलाज चल रहा था।

मैनेजमेंट में आमतौर पर तीन मुख्य नियम पढ़ाए जाते हैं, जो किसी को भी अपने कॅरिअर में नहीं भूलने चाहिए। 1. आप जो उत्पाद बना रहे हैं, उसकी गुणवत्ता से समझौता नहीं करें। 2. उपयोगकर्ता के कार्यक्षेत्र में आपका उत्पाद उसकी मेहनत कम करे। 3. आपके उत्पाद की कीमत ऐसी हो कि समाज का बड़ा तबका उसे आसानी से खरीद सके। और गुलाटी ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने पांचवीं कक्षा में स्कूल छोड़ दिया था लेकिन वे मैनेजमेंट के इन पहलुओं को बहुत अच्छे से समझते थे।

इसमें आश्चर्य नहीं कि वे पूरे जतन से फैक्ट्रियों, बाजारों और विक्रेताओं का तब तक चक्कर लगाते थे, जब तक उन्हें संतोष न हो जाए कि सबकुछ ठीक चल रहा है, यहां तक कि रविवार को भी। मुझे याद नहीं आता कि किसी और ऐसे व्यक्ति ने पैकेट पर अपनी फोटो लगाई हो, जिसके पास मार्केटिंग या ब्रांडिंग की डिग्री न हो।

शायद, गुलाटी को खुद पर भरोसा करना ज्यादा सुरक्षित लगा, क्योंकि सेलिब्रिटी अक्सर विवादों में उलझ जाते हैं, जिससे ब्रांड की छवि को नुकसान होता है। शायद यही कारण था कि उन्होंने अपनी ही तस्वीर रखी। और यह काम कर गई। मैंने खुद कई ग्रामीण महिलाओं को दुकानदार से कहते सुना है, ‘दादाजी वाला मसाला देना।’ शायद गुलाटी को खुद भी भरोसा नहीं रहा होगा कि उनका सीधा-सादा प्रचार और उसकी लाइन ‘असली मसाले सच-सच’ इतनी चल पड़ेगी कि मूंछ वाले ‘दादाजी’ एक दिन ब्रांड बन जाएंगे।

उनकी शुरुआत से ही पढ़ाई में रुचि नहीं थी, पर गुलाटी बदलती तकनीक अपनाने में कभी पीछे नहीं रहे। लेकिन उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि उनके मसालों का स्वाद और गुणवत्ता वही बनी रहे। ज्यादातर कच्चा माल केरल, कर्नाटक से आता था और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए अफगानिस्तान और ईरान से भी आयात होता था।

ग्राहक को केंद्र में रखने की उनकी सोच उन्हें अपने पिता के बिजनेस देखकर मिली, जिन्होंने 1919 में पाकिस्तान के सियालकोट में ‘देगी मिर्च वाले’ नाम से मशहूर दुकान में मसाले बेचने के अलावा आईने, साबुन, हार्डवेयर, कपड़े और चावल तक बेचे। लेकिन विभाजन के बाद परिवार को भारत आना पड़ा। तब 23 वर्षीय गुलाटी जेब में 1500 रुपए लेकर दिल्ली पहुंचे।

उन्होंने 650 रुपए का तांगा खरीदा और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड और करोल बाग से लेकर बाड़ा हिन्दू राव तक सवारियों को केवल 2 आने में लाना, ले जाना शुरू किया। याद रखें, यह भी दूसरों की जिंदगी आरामदायक बनाने वाला बिजनेस था। उन्होंने फिर से मसालों का व्यापार शुरू किया, अपना तांगा बेचकर करोल बाग इलाके में अजमल खान रोड पर लकड़ी की दुकान खरीदी। ‘सियालकोट के महाशियां दी हट्‌टी, देगी मिर्च वाले’ का बैनर फिर लगाया गया।

बेशक, स्कूल छोड़ने वाले गुलाटी को यह समझ थी कि गृहणियों की जिंदगी आसान बनाने के लिए इस्तेमाल के लिए तैयार पिसे मसालों में व्यापार का अ‌वसर छिपा है।

फंडा यह है कि अगर आप लोगों की जिंदगी आसान बनाने को तैयार हैं, तो हमेशा एक कामयाब बिजनेस का अवसर मौजूद है।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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