अगर पक्षियों की चहचहाहट से आपका दिल भर आता है, तो अपने घर का एक कोना उनके लिए छोड़ दें या उनके साथ रहने की कोशिश करें

क्या पशुओं को भी इंसानों की तरह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए? धार्मिक और अन्य कारणों से देश में होने वाली पशुओं की निर्मम हत्या को रोकने और कानून की मंजूरी के बिना उनकी हत्या पर रोक लगाने के लिए लगाई गई एक जनहित याचिका की बुधवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. राम सुब्रमण्यन की पीठ नेे पीपुल्स चैरियोटीर ऑर्गेनाइजेशन नाम के एनजीओ की ओर से पैरवी कर रहे वकील देवेश सक्सेना से सवाल पूछे, सक्सेना ने दलील दी कि पशुओं को भी कानूनी इकाई घोषित कर देना चाहिए।

सीजेआई बोबडे ने कहा, ‘अगर सारे पशुओं को कानूनी इकाई घोषित किया जाता है, तो इसका मतलब होगा कि वे हर्जाने के लिए मुकदमा कर सकते हैं या उन पर मुकदमा किया जा सकता है। क्या वे मुकदमा करने या मुकदमे में शामिल होने में सक्षम हैं? यही कारण है कि पशु क्रूरता अधिनियम (पीसीए) है।’

इस रोचक सुनवाई से मुझे एक व्यक्ति की याद आ गई जो अपने खेत पर विशेष तौर पर पक्षियों के लिए बाजरा बोता है और उन्हें अपनी जमीन का बराबर का हकदार मानता हैै। लॉकडाउन में 62 साल के मुथु मुरुगन ने कोयम्बटूर में अपनी आधा एकड़ जमीन आवंटित कर दी और पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों और छोटे जानवरों के साथ घुलमिलकर रह रहे हैं।

ऐसा पहली बार हुआ है, जब उन्होंने अपनी जमीन का एक हिस्सा विशेष रूप से सिर्फ इनके लिए आरक्षित किया है। उन्होंनेे अप्रैल में ज्वार-बाजरा के बीज बोए और 3 महीने में फसल तैयार हो गई। अब जब वह रोज़ सुबह-शाम धोती और अंगवस्त्रम पहनकर घूमने निकलते हैं, तो उन्हें ना सिर्फ आमतौर पर दिखने वाले कबूतर, कौए और चमगादड़ दिखती हैं, बल्कि खेत पर कई गौरेयां, मोर, तोते, किंगफिशर और गिलहरी दिखती हैं, जो इत्मीनान से अनाज लेकर पेटभर खाते हैं और आराम से चले जाते हैंं।

ऐसा इसलिए है क्योंकि उनको पता है कि यह जगह उनकी है। और अगर उन्हें प्यास लगती है, तो मुुथु द्वारा रखे गए सकोरों से अपनी प्यास बुझाते हैं। मुथु पक्षियों को मेहमानों की तरह देखते हैं और उनके साथ उपज बांटने से परहेज नहीं करते। मुथु उन्हें परेशान नहीं करते और दूर से पक्षियों को देखते हैं।

मुथु का खेत भी उन पेड़ों से घिरा हुआ है, जो उन्होंने पक्षियों के घोंसलों के लिए लगाए थे। उनमें से कई पेड़ पक्षियों द्वारा गिराए गए बीज़ों से अंकुरित हुए। वह सिंचाई के लिए रेन वाटर हार्वेंस्टिंग व खाद के लिए गोबर का प्रयोग करते हैं। इस तरह उन्होंने पूरी खाद्य शृंखला विकसित कर ली है। पक्षी और छोटे पशु कीड़े-मकोड़ों को खत्म कर देते हैं।

मुथु की आगे भी खेत का कुछ हिस्सा पक्षियों के लिए छोड़ने की योजना है, तािक दूसरे किसान ऐसा करने के लिए प्रेरित हों। उन्हें महसूस होता है कि अधिकांश किसान नकदी फसलों की ओर जा रहे हैं, इमारतें खेत हथियाती जा रही हैं, ऐसे में पक्षियों को भोजन नहीं मिल पा रहा है।

कोयम्बटूर में पक्षियों की संख्या कम हो गई है, मुुथु उन्हें वापस लाना चाहते हैं और किसानों को ईश्वर की बनाई हुई इस रचना के लिए कुछ करने को प्रेरित करना चाहते हैं। धीरे-धीरे मुथु का खेत फोटोग्राफर्स की पसंदीदा जगह बनता जा रहा है, जो कि एशी प्रिनिया, स्केली ब्रेस्टेड मुनिया और वाइट रम्प्ड मुनिया को अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं।

फंडा यह है कि अगर पक्षियों की चहचहाहट से आपका दिल भर आता है, तो अपने घर का एक कोना उनके लिए छोड़ दें या उनके साथ रहने की कोशिश करें।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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