अगर युवा, सामाजिक प्रतिबद्धता के बिना अकेले रहने ही ‘जगह’ मांग रहे हैं, तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि वे मानसिक अवसाद का शिकार न हो जाएं

इस शुक्रवार एक वेबिनार के दौरान मुझसे एक कुंवारी युवती ने पूछा, ‘आपको नहीं लगता कि इस महामारी ने हम जैसे लोगों को बढ़ावा दिया है, जो अकेले रहना चाहते हैं क्योंकि इसमें सामाजिक दबाव कम है और अपनी मर्जी से रह सकते हैं?’ जब मैंने उससे पूछा कि उसे ऐसा क्यों लगता है तो वह बोली, ‘मेरे माता-पिता ने शादी के लिए पीछे पड़ना बंद कर दिया है और मैं समाज की किसी उम्मीद के बिना जीवन का आनंद ले रही हूं। मुझे इस ‘कॉन्टैक्टलेस’ समाज में मजा आ रहा है।’ इससे मुझे दक्षिण कोरिया के समुदाय ‘होनजोक’ की याद आई (होन यानी अकेला और जोक मतलब समुदाय)। जब ‘होनजोक’ अकेले खाते हैं तो उनके लिए एक नया शब्द ‘होनबैप’ है, अकेले पीने वाला ‘होनसूल’, अकेले खेलने वाला ‘होननोल’, अकेले यात्रा करने वाला ‘होनहेअंग’, अकेले फिल्म जाने वाला ‘होनयेओंग’ और अकेले खरीदारी करने वाला ‘होनशो’ कहलाता है। ये उन कई शब्दों में से हैं, जो इस समुदाय ने उस देश में बनाए हैं।

जब ये सभी गतिविधियां करते हैं, बिजनेसमेन सोचते हैं कि वे बढ़ती हुई ‘होनकोनॉमी’ में योगदान देते हैं। यही कारण है कि उस देश में बैंक अकेले ग्राहकों को सिंगल हाउसहोल्ड क्रेडिट कार्ड देते हैं, बार व रेस्त्रां कई मुफ्त सेवाओं व ‘होनजोक’ लेबल वाली टेबलों से उन्हें लुभाते हैं। सिक्कों से चलने वाले केराओके बूथ और सिंगल सीट गलियारे वाले सिनेमा भी हैं। ‘होनजोक’ की जिंदगियां और उनकी साहसिक गतिविधियां बताने वाले ‘आई लिव अलोन’ और ‘ड्रिंकिंग सोलो’ नाम के टीवी शो आते हैं। न्यूज चैनल्स में ‘1कोनॉमी’ नाम के सेक्शन हैं, जो अकेले रहने वालों से जुड़ी खबरें देते हैं। ऐसे कम्यूनिटी एप्स और वेबसाइट हैं, जहां वे अपनी जिंदगी की तस्वीरें पोस्ट कर अन्य ‘होनजोकों’ के लाइक्स के माध्यम से साझा पहचान बनाते हैं और जीवन को मान्यता देते हैं।

एक यूट्यूबर है जो ‘1 पर्सन 2 कैट्स’ नाम का चैनल चलाता है। कुल मिलाकर युवा साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि यह नई जीवनशैली है, जबकि समाज अब भी सोचता है कि यह अधूरी जीवनशैली है। कोविड-19 के हमले से पहले इस देश की युवा आबादी 6 सालों से अकेले रह रही थी और उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। वे घर जाते हैं, यूट्यूब देखते हैं, किताबें पढ़ते हैं, स्मार्टफोन पर समय बिताते हैं, जैसे हमने लॉकडाउन में किया।

दक्षिण कोरिया में ‘होनजोक’ जीवन आधुनिक समय का संकेत है और कुछ को लगता है कि इस अवस्था को मनाना चाहिए, इसमें शर्मिंदगी की बात नहीं है। इस उम्र में वे शायद सही हों लेकिन वे भूल रहे हैं कि मानव जाति ने हमेशा ही किसी के साथ घर साझा किया है। हम माता-पिता, भाई-बहन के साथ बड़े होते हैं, कॉलेज में दोस्तों के साथ रहते हैं और फिर जीवनसाथी के साथ परिवार बनाते हैं। इसके अलावा सभी वैश्विक शोध बताते हैं कि अकेले रहने वालों में ज्यादा मानसिक समस्याएं होती हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि दक्षिण कोरिया में ‘होनजोक’ प्रवृत्ति के साथ स्वास्थ्य और आबादी संबंधी चिंताजनक रुझान देखे जा रहे हैं। साल 2014 के बाद से अवसाद का इलाज करा रहे युवाओं की संख्या दोगुनी हो गई है। युवा बेरोजगारी, शादी दर और जन्मदर भी सबसे निचले स्तर है।

फंडा यह है कि अगर युवा, बिना किसी सामाजिक प्रतिबद्धता के, अकेले रहने ही ‘जगह’ मांग रहे हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तथाकथित ‘आजादी’ से वे मानसिक अवसाद का शिकार न हो जाएं।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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