अगर हम चाहते हैं कि हमारी अगली पीढ़ी औपचारिक रूप से शिक्षित न होकर उच्च स्तर पर शिक्षित हो, तो इसकी जिम्मेदारी केवल स्कूल नहीं संभाल सकते

किसी से भी पूछिए कि देश का सबसे साक्षर राज्य कौन-सा है और पलक झपकते ही जवाब मिलेगा, केरल। लेकिन ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता होगा कि वे ऐसा क्या करते हैं, जो हम नहीं कर सकते। उनका सुदृढ़ विश्वास है कि स्कूल और कॉलेज अकेले हमारे बच्चों को औपचारिक शिक्षा नहीं दे सकते। यह समाज की भी जिम्मेदारी है। केरल में समाज कई चीजें करता है। उनमें से एक यह है।

इस महीने वहां ‘जनकीय पडना सहाय पद्धति’ नामक परियोजना की शुरुआत हुई, जिसे ग्राम पंचायत अधिकारियों के सहयोग से लागू किया जा रहा है। केरल के अलप्पुझा जिले में कांजीकुझी गांव के निवासियों ने कोविड-19 लॉकडाउन के कारण स्कूली पढ़ाई में परेशानी झेलने वाले 10वीं और 12वीं के छात्रों तक पहुंचने के लिए इस परियोजना की शुरुआत की है।

गांव में 18 वार्ड हैं और ग्राम पंचायत अधिकारियों को महसूस हुआ कि हर वार्ड में करीब 50 ऐसे छात्र हैं जो मार्च में सार्वजनिक परीक्षाओं में शामिल होंगे। इसीलिए उन्होंने सभी जगहों पर वार्ड स्तर के अध्ययन केंद्र स्थापित करने का फैसला लिया।

ग्रामीणों ने परियोजना के निर्बाध क्रियान्वयन के लिए हर वार्ड में समितियां बनाई हैं। शिक्षा से जुड़े लोग इन समितियों का नेतृत्व करते हैं। समिति हफ्ते में दो-दो घंटे की दो कक्षाएं आयोजित करती है। वे इन कक्षाओं के लिए शिक्षकों और अन्य विशेषज्ञों को आमंत्रित करते हैं। कक्षाओं में मुख्यत: रिवीजन, छात्रों की शंकाएं, पुराने प्रश्नपत्रों पर चर्चा के अलावा पर्सनालिटी डेवलपमेंट सत्र शामिल होते हैं।

क्या आप सोच रहे हैं कि बाकी क्या करते हैं? कुछ ग्रामीण स्टडी मटेरियल की व्यवस्था करते हैं, जबकि कुछ छात्रों और शिक्षकों के लिए चाय-नाश्ते की। जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे सुनिश्चित करते हैं कि देर शाम की कक्षाओं के बाद छात्र सुरक्षित घर पहुंचे। संक्षेप में, पूरे गांव के लिए यह परीक्षा का और छात्रों को मानसिक रूप से तैयार कर उनका आत्मविश्वास बढ़ाने का समय है।

जब आपके आसपास ऐसा दूरदर्शी समाज हो, तो आप इसे लेकर निश्चिंत हो जाते हैं कि छात्र कैसे अच्छा प्रदर्शन करेंगे, साथ ही वे कैसे बड़े होकर समाज की भलाई के बारे में सोचेंगे। जॉब जैकब का उदाहरण देखें, जिसने कोचि के फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से बीटेक किया है। उसके ‘ह्यूमनॉइड रोबोट’ में बुजुर्गों की मदद करने और उनसे निजी संवाद करने की क्षमता है।

जैकब ने इसे अंतिम वर्ष के प्रोजेक्ट के तहत बनाया था। इसकी आंखें टेबल टेनिस गेंद के दो आधे हिस्सों से बनी हैं और इसके एक्चुएटर (प्रवर्तक) होठों को इस तरह हिलाते हैं, जैसे रोबाट बात कर रहा हो। कोहनियों के जोड़ एक्रिलिक से और बाकी संरचना पीवीसी पाइपों से बनी है। इसकी लागत 30 हजार रुपए है और नाम ‘हे’ है।

यह बुजुर्गों का चेहरा पहचानकर उनसे आपसी संवाद करने, उन्हें दवा खाना याद दिलाने, खबर और मौसम की जानकारी देने तथा गाने बजाने में सक्षम है। यह लोगों से मिलकर उनका अभिवादन भी करता है और बुजुर्गों को मदद की जरूरत पड़ने पर दूसरों को अलर्ट भेज सकता है। रोबोट में चेहरा पहचानने और सीमित तरीके से सवालों के जवाब देने की क्षमता भी है। इसमें दो मोड हैं। वॉइस कमांड तो है ही, साथ ही वेब इंटरफेस के जरिए इसे अधिकृत व्यक्ति ऑनलाइन नियंत्रित कर सकता है। दूर बैठा अधिकृत व्यक्ति रोबोट के जरिए बुजुर्ग तक संदेश भी पहुंचा सकता है।

जैकब की रोबोट में और क्षमताएं बढ़ाने की योजना है, जिसमें ऑटोनोमस इनडोर नैविगेशन शामिल है। साथ ही वह पूरे प्रोजेक्ट को ओपन-सोर्स (सभी के लिए उपलब्ध) रखना चाहता है, जो उसका समाज के लिए बड़ा योगदान होगा।

फंडा यह है कि अगर हम चाहते हैं कि हमारी अगली पीढ़ी औपचारिक रूप से शिक्षित न होकर उच्च स्तर पर शिक्षित हो, तो इसकी जिम्मेदारी केवल स्कूल नहीं संभाल सकते।

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