अच्छी आदतें शुरू करने के लिए नए साल के इंतजार की जरूरत नहीं,यदि अभी से अमल करते हैं तो आपका दिल उसकी गवाही जरूर देगा

संभवत: वह मप्र के जबलपुर शहर स्थित सदर और मंडला रोड को जोड़ने वाले पेंटीनाका चौक पर कार सवारों को चारों दिशाओं में 60 सेकंड तक सिग्नल के खुलने का इंतजार करना पड़ता है। पिछले दिनों जब हम कार में इसी सिग्नल पर खड़े थे, तो पीछे एक फोर्ड एसयूवी सवार ने जोरों से ब्रेक लगाए और हॉर्न बजाने (हॉन्किंग) लगा, जबकि रेड सिग्नल दिखा रहा था कि ग्रीन सिग्नल में अभी पूरे 59 सेकंड बाकी हैं। यह दोपहर के 3:30 बजे की बात है और इस समय मौसम खराब होने लगा था।


मैंने उस शोर मचा रही गाड़ी की क्लास के बारे में बता दिया है, ताकि आप समझ जाएं कि उस ऊंची गाड़ी के ड्राइवर के लिए यह देखना बड़ा आसान रहा होगा कि सिग्नल रेड है। लेकिन, बावजूद इसके उसका हॉर्न बजाना जारी था। हर गाड़ी वाला पीछे की ओर इस चिंता से देख रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ हो गई है या फिर वह गाड़ी वाला किसी मेडिकल इमरजेंसी में है। उस ब्रांड न्यू एसयूवी में ड्राइवर सीट पर अच्छे कपड़े पहने एक युवा बैठा नज़र आया, जिसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वह किसी परेशानी में है! हमारी लाइन में लगे कार वाले एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे, कुछ व्यंग्य मुद्रा में मुस्कुरा रहे थे और कुछ ने सिर पर हाथ रख लिया था और उनके हावभाव का अनुवाद किया जाए तो उसके शब्द कुछ ऐसे होंगे, ‘ऐसे अमीर मां-बाप की औलादों का क्या किया जाए?’ और इस सब से बेखबर वह एसयूवी वाला युवा ड्राइवर सिग्नल के ग्रीन होने तक हॉर्न बजाए जा रहा था। मैंने ड्राइवर से कहा, ‘आगे निकलो, और इस बेसब्र आदमी को थोड़ी जगह दे दो’। जैसे ही ऐसा हुआ, वह एक ‘विजेता’ की तरह हमारी कार को बेहद करीब से कट मारते हुए तेजी से आगे निकल गया। यह ठीक वैसा ही था, जैसा कार रेस में एक विजेता करता है। 

इस घटना ने मुझे बेंगलुरू के भारती अथिनारायणन की याद दिला दी, जिन्होंने जुलाई 2016 में एक कैंपेन शुरू किया था ताकि लोगों को जबरन हॉर्न न बजाने (नो हान्किंग) के प्रति जागरूक किया जा सके। सबसे पहले उन्होंने खुद को अनुशासित किया और हॉर्न बजाने पर नियंत्रण रखा। मई 2019 तक वे बिना हॉर्न बजाए अपनी बुलेट से 10,500 किमी और जीप से 15,000 किमी का सफर कर चुके हैं। वे अब भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर गाड़ियों के बीच से रास्ता बनाते हुए लोगों को बेवजह हॉर्न न बजाने से हतोत्साहित करने के लिए कारों और दो पहिया वाहनों पर इस आशय का लेबल लगाते हैं।


अमेरिकन टेलीफोन एंड टेलीग्राफ कंपनी में मुख्य इंजीनियर अथिनारायणन के तरकश में हॉन्किंग रोकने के लिए कई तरह के शस्त्र स्टिकरों के रूप में हैं। इनमें टनो हॉन्किंग’, ‘हॉर्न नॉट ओके प्लीज’, ‘क्वाइट प्लीज’ के साथ ‘नो हॉन्किंग अनलेस फॉर डेंजर’ जैसे कई वन-लाइनर भी हैं और सभी में ‘नो हॉन्किंग’ का संकेत अच्छी तरह से दिखाई देता है। सामान्य तौर पर गाड़ी के हॉर्न की ध्वनि तीव्रता 84 डेसिबल्स (डीबी) से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन देश में कई क्षेत्रीय परिवहन विभागों ने पाया है कि उनके यहां सड़कों पर हॉर्न की तीव्रता 135 डेसिबल्स तक है। 90 डेसिबल्स से ज्यादा तीव्रता पर सुनने की क्षमता कम होने लगती है और 120 डेसिबल्स पर ये क्षमता खत्म भी हो सकती है। हमारे यहां अधिकांश आरटीओ नापने के मीटर न होने के कारण ‘नो हॉन्किंग’ जैसा नियंत्रण करने में अक्षम हैं। अथिनारायणन से प्रेरित होकर, उनके मित्र, श्रीहरि नरसिम्हन ने भी पिछले दो साल से हॉर्न नहीं बजाया है। अब वे भी ‘नो हॉन्किंग’ के स्टिकर सबको दिखाते हैं और पूरे शहर में शांति का संदेश फैलाते हैं। जाहिर तौर पर, आपके दिल के अलावा, ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जो इस बात का सर्टिफिकेट दे सके कि, ‘आपने कभी हॉन्किंग नहीं की’।


फंडा यह है कि  अच्छी अादतें शुरू करने के लिए नए साल के इंतजार की जरूरत नहीं है। यदि अभी से उस पर अमल करते हैं तो आपका दिल उसकी गवाही जरूर देगा।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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