अच्छी नींद जिंदगी का आधारभूत नियम, जो जिंदगी बेहतर बनाती है, एक दिन की बात नहीं है; सालभर का काम

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

गुरुवार की रात भारत-इंग्लैंड का चौथा टी20 मैच देखते हुए मेरा घर दो टीमों में बंट गया। बहस उस ‘सॉफ्ट सिग्नल’ पर थी, जो फील्ड पर मौजूद अंपायर केएन अनंतपद्मानाभन ने दिया था, जब सूर्यकुमार यादव का शानदार शॉट उड़कर डीप फाइन-लेग पर डेविड मलान तक पहुंचा, जिन्होंने विवादास्पद कैच लिया। अनंतपद्मानाभन ने थर्ड अंपायर को रेफर करने से पहले ‘आउट’ का इशारा कर सॉफ्ट सिग्नल दिया।

रिप्ले देखकर लगता है कि मलान ने गेंद जमीन पर लगा दी थी, लेकिन टीवी अंपायर वीरेंदर शर्मा ने फैसला दिया कि ‘सॉफ्ट सिग्नल’ को गलत बताने के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं और आउट का निर्णय सही है। इस विवादास्पद फैसले पर टिप्पणी करते हुए भारतीय कप्तान विराट कोहली ने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि मैदान पर ज्यादा स्पष्टता न होने की स्थिति में ऑन-फील्ड अंपायर ‘मुझे नहीं पता’ का फैसला क्यों नहीं ले सकते।’ इसपर भी चर्चा हुई कि मलान आगे आकर ईमानदारी से क्यों नहीं कह सकते थे कि बॉल जमीन को छुई थी या नहीं।

इस बेनतीजा बहस में परिवार की नींद के करीब दो घंटे छीन लिए और इस तरह 19 मार्च, शुक्रवार को हमारी शुरुआत बुरी हुई, जिस दिन ‘वर्ल्ड स्लीप डे’ मनाया जाता है। इस साल इसकी थीम ‘नियमित नींद, स्वस्थ भविष्य’ है। चूंकि हमारे पास करने को कुछ और नहीं था, इसलिए हमने उस मुद्दे पर फिजूल चर्चा की, जिससे हम पेशेवर रूप से नहीं जुड़े हैं।

दिलचस्प यह है कि अहमदाबाद के कुछ स्कूलों द्वारा वर्ल्ड स्लीप डे के अवसर पर किया गया सर्वे बताता है कि 70% स्कूली बच्चे 60-90 मिनट देर से सोने लगे हैं और महामारी से पहले की तुलना में उनका औसत स्क्रीन टाइम 300% बढ़ गया है। साथ ही कम से कम 65% बच्चे सुबह उठने के बाद तरोताजा और खुश महसूस नहीं करते।

ऐसा सिर्फ बच्चों के साथ नहीं है, बल्कि दुनिया में सभी को नींद संबंधी समस्याएं हैं। सांस संबंधी रोगों के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कम नींद से समझने और कार्यों को करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, जबकि खराब नींद का संबंध खराब मानसिक स्वास्थ्य से भी है। मैं उस दौर में बड़ा हुआ, जहां कम से कम बच्चों के लिए तो सोने का समय तय होता था। यह रात 9 बजे था। साल के 365 दिन रात 9 से 9.15 के बीच घर अंधेरे में डूब जाता था, जब रेडियो पर अंग्रेजी खबरें आती थीं।

कभी-कभी ही वह हवामहल कार्यक्रम तक जाती थी। उन दिनों भी विविध भारती पर फिल्म संगीत के अलावा कई कार्यक्रम आते थे। इनमें जयमाला (फौजियों के लिए कार्यक्रम), हवामहल, इनसे मिलिए, भूले-बिसरे गीत, संगीत सरिता, चित्रलोक और छायागीत शामिल थे। ये कार्यक्रम कभी मेरे पिता के जीवन का हिस्सा नहीं थे लेकिन मुझे बचपन से ही पसंद थे। ध्यान खींचने वाले इन कार्यक्रमों के बावजूद मेरे सोने के समय की पिता निगरानी करते थे और सख्त निर्देश थे कि अगर मैं 10 बजे तक जागा तो सबकुछ बंद कर दिया जाएगा।

आज की नई जीवनशैली देखते हुए, इसमें आश्चर्य नहीं कि होटल मेहमानों को सोने का विशेष अनुभव दे रही हैं और अच्छी नींद की जगह के रूप में खुद का प्रचार कर रही हैं। और वर्क फ्रॉम होम करने वाले उनकी सेवाएं ले रहे हैं। इसके अलावा चंदन या लैवेंडर के तेल, अंधेरा करने वाले परदे, विशेष कपूर भी ‘इसेंशियल’ के नाम पर बेचे जा रहे हैं, जैसे इनके बिना हम जिंदगी में सो ही नहीं सकते।

फंडा यह है कि अच्छी नींद जिंदगी का आधारभूत नियम है, जो निश्चित तौर पर जिंदगी बेहतर बनाती है। अच्छी नींद सिर्फ एक दिन की बात नहीं है, बल्कि सालभर का काम है, जिसपर निगरानी रखना जरूरी है।

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