अच्छे माहौल में बचपन बिताने वाले बच्चे संवेदनशील और दयालु इंसान बनकर दुनिया को भी खूबसूरत बनाते हैं

Management Funda By N. Raghuraman

सोमवार की सुबह मैं उदास था। मैंने एक नींबू, तीन लौकियां, नौ बैंगन, 23 टमाटर और करीब 40 मिर्चियां खो दी थीं। आप सोचेंगे कि यह मुझे क्या हो गया जो मैं खोई हुई सब्जियां गिन रहा हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे फ्रिज में रखी सब्जियां नहीं थीं बल्कि पौधों पर लगी सब्जियां थीं। उनके फूल से सब्जियां बनने के दौरान मैं उनसे रोज़ाना मिलता था। जब आप किसी चीज़ को रोज़ ही धीरे-धीरे बढ़ते देखते हैं तो आपका उससे अलग संबंध हो जाता है।

इस रविवार जब मैं आईपीएल के दो बेहद रोचक मैचों में डूबा था, जिनमें पहले सुपर और फिर आधी रात तक डबल सुपर ओवर हुए, तब बाहर तेज बारिश हो रही थी। ये छोटे पौधे अपने बच्चों (पढ़ें सब्जियों) को संभाल नहीं पाए। सोमवार को जब मैं अपने बगीचे में गया, तो मुझे यूं लगा जैसे वे आसपास बिखरे मृत फूलों और सब्जियों के लिए मातम मना रहे हों। मैंने उनसे कुछ देर बात की। मुझे नहीं पता कि उन्हें बेहतर लगा या नहीं, लेकिन मुझे दु:खी मां-बाप से बात कर अच्छा लगा।

मेरे जीवन में पहली बार मैं हमारे किसानों के दर्द का शायद 100वां हिस्सा महसूस कर पा रहा था। वह दर्द जो वे प्रकृति की मार सहते हुए साल-दर-साल झेलते हैं। लगभग एक घंटे में यूं ही बैठा रहा। मेरे मूड को समझते हुए मेरे पालतू कुत्ते चीकू और चीनी टेबल पर चढ़कर मुझे देखते रहे। वे जानते हैं कि मुझे सामान्य करना उनका काम है। एक ने मेरा हाथ चाटना शुरू कर दिया तो दूसरा मुझसे अपनी पीठ सहलवाने के लिए पंजे मारने लगा। चूंकि मैं पूरे जीवन जानवरों के साथ पला-बढ़ा हूं, इसलिए उनकी मंशा, हावभाव आदि आसानी से समझ लेता हूं। मैंने किताबें पढ़कर भी जानवरों के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाया है।

हाल ही में मैंने ऐसी ही किताब ‘द ज़ू इन माय बैकयार्ड’ पढ़ी, जिसे ऊषा राजगोपालन ने लिखा है। उनका बचपन केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में बड़े पुश्तैनी घर में बीता, जहां ढेरों पेड़-पौधे थे। उनके पिता भारतीय वन सेवा में थे और अक्सर घर पर जानवरों के घायल या छोड़ दिए गए बच्चे लाते थे। ऊषा पिता के साथ उनकी देखभाल करतीं और ठीक होने के बाद जानवर उसी शहर के चिड़ियाघर भेज दिए जाते। इस तरह उनका बचपन कई शावकों, पौधों और पेड़ों के बीच बीता। उनकी किताब में उनके घर के कई मजेदार किरदार हैं। सभी के उपनाम (निकनेम) भी हैं, जिनसे उन्हें वास्तविक जीवन में पुकारा जाता था।

किताब में उन अनुभवों को मजेदार ढंग से पेश किया गया है, जिनमें वे एक केशवन नाम के बंदर का जिक्र करती हैं, जो फ्यूज़ बॉक्स से तार निकाल देता था, जिससे घर के कई हिस्से अंधेरे में डूब जाते थे। उनके पिता फिर टॉर्च लेकर सुधारने जाते थे। शायद वह बंदर चाहता था कि वे जल्दी सो जाएं। हमारे आसपास का हर जानवर ऐसे ही संवेदनशील होता है। वे हमेशा चाहते हैं कि इंसान समेत हर जीव खुश रहे और वे उन्हें आराम पहुंचाने के लिए सबकुछ करते हैं। यकीन मानिए, जब आप ईश्वर की दूसरी रचनाओं को समझते हैं तो जिंदगी और बेहतर लगने लगती है।

फंडा यह है कि जैसे माहौल में ऊषा राजगोपालन का बचपन बीता, वैसे ही माहौल में जब आप अपने बच्चों को पलने-बढ़ने देते हैं, तो वे न सिर्फ संवेदनशील बनते हैं बल्कि एक दयालु इंसान बनकर इस दुनिया को और भी खूबसूरत बनाते हैं।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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