अच्छे शिक्षक पढ़ाना और सिखाना सिर्फ स्कूली छात्रों तक ही सीमित नहीं रखते, बल्कि वे एक पूरी पीढ़ी को बेहतर बनने में मदद करते हैं

असम के 19 वर्षीय आजाद मोसारोफ को सितारों और आसमान से शायद तब प्यार हो गया जब वह हसनपुर गांव में अपने घर के बाहर सोता था। शायद यही कारण था कि आजाद हमेशा से ही ब्रह्मांड के प्रति आकर्षित था और अंतरिक्ष के बारे में जानना चाहता था। उसने मन में किसी दिन इसरो का सदस्य बनने ही महत्वाकांक्षा बना ली।

लेकिन उसके पिता मनिरुल इस्लाम के पास केवल दो बीघा जमीन है। मनिरुल किसान हैं और उनकी पत्नी परिवार की आय में सहयोग के लिए बीड़ी बनाती हैं। आजाद अपने परिवार में हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करने वाला पहला व्यक्ति है। एक दिन आजाद ने पिता से कहा कि वह आईआईटी में पढ़ना चाहता है और उसे कोचिंग के लिए करीब 40 हजार रुपए चाहिए। पिता ने न तो कभी आईआईटी का नाम सुना था और न उनके पासे इतने पैसे थे। लेकिन वे युवा बेटे की आंखों में सपने पढ़ सकते हैं।

उन्होंने अपनी जमीन का 7,200 वर्गफीट हिस्सा बेच दिया और आजाद इस साल जनवरी में जेईई (मेन) में बैठा, जिसमें उसके 93% अंक आए। इस गुरुवार वह फिर से अपने गांव से 200 किमी सफर कर कोलकाता पहुंचा, जहां उसने अपने अंक सुधारने के लिए फिर से यह परीक्षा दी।

आजाद की कहानी से मुझे नागपुर के सरस्वती विद्यालय में मेरे प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका स्वर्गीय सरस्वती कुप्पुस्वामी की याद आई। कई बार मैं उनके घर जाता था। वे दक्षिण भारतीय मजदूरों के साथ व्यस्त रहती थीं, जो नागपुर में रेलवे ट्रैक्स को डबल करने का काम कर रहे थे। चूंकि उन्हें महीनों खुली जमीन पर काम करना होता था और उनका कोई डाक का पता नहीं होता था, इसलिए वे पोस्टकार्ड और चिटि्ठयों के लिए मेरी शिक्षिका के घर का पता इस्तेमाल करते थे।

साठ-सत्तर के दशक में टेलीफोन केवल अमीरों के लिए थे। चूंकि ये कामगार अशिक्षित थे, तो वे उनके लिए चिट्‌ठी लिखती और उनके जवाब पढ़ती थीं। इसलिए उनके स्कूल से लौटने पर मजदूर उनके घर इकट्‌ठा होते थे।

चिट्‌ठी लिखते समय कामगार शिक्षिका से पालतू जानवरों की सेहत और जमीन व फसल की हालत के बारे में पूछने को कहते थे, लेकिन कभी बच्चों की शिक्षा के बारे में नहीं पूछते थे। वह शिक्षिका ही थीं जो मजदूरों से कहती थीं कि हर व्यक्ति को अपने बच्चों की शिक्षा के बारे में जरूर पूछना चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए जिससे परिवार को आगे बढ़ने में मदद मिले। इसलिए हर चिट्‌ठी में यह लाइन अनिवार्य रूप से जोड़ी जाती, ‘उम्मीद है कि बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा रहे होंगे और अच्छे से पढ़ रहे होंगे’।

दशकों बाद जब मैंने गल्फ (खाड़ी देश) में काम करना शुरू किया, तो हर शुक्रवार (जब वहां छुट्टी होती और टेलीफोन दर 50% सस्ती होती थी) मैं दक्षिण से आए कामगारों को सार्वजनिक टेलीफोन बूथ पर परिवारों से बात करते सुना करता था। वे अपनी पत्नी से पूछते थे कि क्या बच्चे स्कूल गए? मैंने तब उनपर स्टोरी भी की थी, ‘गल्फ में भारतीय मजदूर यह जानना क्यों चाहते हैं कि भारत में उनके बच्चे रोज स्कूल जा रहे हैं’। ऐसा इसलिए था क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चों को भी गल्फ आकर भयानक गर्मी में मजदूरी करनी पड़े।

फंडा यह है कि मेरा विश्वास है कि अच्छे शिक्षक पढ़ाना और सिखाना सिर्फ स्कूली छात्रों तक ही सीमित नहीं रखते, बल्कि वे एक पूरी पीढ़ी को बेहतर बनने में मदद करते हैं। मैं ऐसे शिक्षकों को नमन करता हूं।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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