अपना मकान’ निश्चित तौर एक कमाई हुई संपत्ति है पर पीढ़ियों के बीच परवाह के साथ ‘अपना घर’ हमें एक छत के नीचे प्यार के धागे से बांधे रखता है

एक हफ्ते पहले मेरे एक रिश्तेदार के किराएदार मुंबई केे दूरवर्ती उपनगर थाणे जिले चले गए, जहां उनके पैरेंट्स रहते हैं। इसके बावजूद कि दोनों डॉक्टर हैं, अच्छी कमाई करते हैं और उनका हॉस्पिटल भी बीच शहर में है, इसलिए उन्होंने मेरे रिश्तेदार का घर किराए पर लिया था।
अपने पैरेंट्स के साथ शिफ्ट होने का अचानक निर्णय उन्होंने तीन कारणों से लिया! 1. जनवरी तक बच्चों के स्कूल नहीं खुलने वाले। 2. महामारी के चलते दोनों डॉक्टर अस्पताल में व्यस्त हैं और बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। 3. बच्चे दो बेडरूम के अपने उस हाईराइज अपार्टमेंट में कैद से हो गए है, जहां सोसायटी भी उन्हें नीचे आने और पार्क में खेलने की इजाजत नहीं दे रही है। उन्हें लगा कि यहां से दूर पैरेंट्स के घर में बच्चे कम से कम खुले आसमान के नीचे, बगीचे में वक्त बिता सकते हैं और इसके अलावा बात करने को दादा-दादी होंगे।
लॉकडाउन में ढील के साथ, सिर्फ दंपती ही नहीं, जो पहले अकेले रहना चाहते थे, पर युवा वयस्क भी जो पढ़ने या अपनी दम पर अपनी जिंदगी बनाने के लिए अकेले रह रहे थे, अब अपने पैरेंट्स के साथ आकर रह रहे हैं। यहां तक कि अमेरिका में भी, जहां की जीवनशैली को अधिकांश भारतीय अपनाना चाहते हैं, वहां भी 29 लाख से ज्यादा वयस्क मार्च-अप्रैल और मई के दौरान अपने पैरेंट्स या ग्रैंड पैरेंट्स के साथ शिफ्ट हो गए और इसमें छात्रों की संख्या शामिल नहीं है।
यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। 2010 के बाद से अमेरिका में एक साथ कई पीढ़ियां एक छत के नीचे रहकर बढ़ रही हैं। वहीं भारत में जहां हम सदियों से साथ रहे, वहां धीरे-धीरे एकल परिवार होने लगे हैं। लोक स्वास्थ्य की समस्या को अलग रखें, पिछले एक दशक में घर में रहने वाले युवाओं का बढ़ा अनुपात बताता है कि अमेरिकंस उस समाज को चुन रहे हैं, जिसमें पीढ़ियों के बीच मजबूत संबंध हों, जिस संस्कृति को भारत हमेशा मानता है।
महामारी ने इस चीज को और गति दे दी है और शिफ्टिंग से वित्तीय मदद के अलावा नजदीकियां बढ़ने से अमेरिकंस इस बदलाव का स्वागत कर रहे हैं। पर कुछ लोगों के लिए यह अंतर पाटना मुश्किल हो रहा है, जब वह घर से बाहर निकले थे तो कैसे थे और आज वे कैसे हैं।
घर वापस जाने का मतलब है कि उन सब आदतों को एक बैग में भरकर पास में कहीं छुपा देना। पर वहीं दूसरी ओर वयस्क होने के साथ लोग आमतौर पर अपने पैरेंट्स के साथ, किशोरावस्था से कहीं बेहतर तरीके से घुलमिल जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अब उनके खुद के बच्चे हैं और वे उनके साथ वही सब कर रहे हैं, जो वह अपनी किशोरावस्था में माता-पिता के साथ करते थे। जहां टीन्स पैरेंट्स से अपने बारे में अक्सर छिपाते हैं, वयस्क होते लोग आमतौर पर खुल जाते हैं। इससे तीन पीढ़ियों के बीच गहरा संबंध और व्यापक संवाद की संभावनाएं खुलती हैं।
अमेरिका में कई लोग महामारी के बाद पैरेंट्स के साथ शिफ्ट होने की इस नई व्यवस्था को अच्छा मान रहे हैं। परिपक्व युवाओं के बीच नए और सराहनीय विचार भी उभर रहे हैं। उनको लगता है कि अभी भी वे पार्टी कर सकते हैं और अपनी एज ग्रुप में बातचीत के साथ, घर लौटकर उन्हीं मुद्दों पर अपनी उम्र से बड़े लोगों का नजरिया भी जान सकते हैं। संक्षेप में कहें, तो अविवाहित लोग और यंग पैरेंट्स का रुख साफ है कि महामारी से उपजी वित्तीय और दूसरी समस्याओं को संभालने के लिए, अपने साझा किए घर पर मुश्किल से गुजारा करने से बेहतर है कि पैरेंट्स के साथ शिफ्ट हो जाएं।
फंडा यह है कि ‘अपना मकान’ निश्चित तौर एक कमाई हुई संपत्ति है पर पीढ़ियों के बीच परवाह के साथ ‘अपना घर’ हमें एक छत के नीचे प्यार के धागे से बांधे रखता है!एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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