अपने जुनून को दूरदराज के इलाकों में ले जाने का सही समय है, जहां काम करने और रहने की लागत कम हो, ताकि यह भविष्य का पेशा बने

बॉम्बे, जिसे बाद में मुंबई कर दिया गया, के घने लेकिन जोशपूर्ण शहर में हमारी दोस्ती 40 साल से फल-फूल रही है। लेकिन 6 महीने घर पर रहने के बाद उसे और उसकी पत्नी को यह स्पष्टता मिली कि उनके लिए क्या जरूरी था। वे अपने दोनों पक्षों के बुजुर्ग होते माता-पिता के करीब रहना चाहते थे और उन्हें देश के सबसे महंगे रियल एस्टेट मार्केट में एक छोटे से अपार्टमेंट के मालिक बनने और वहां की जीवनशैली में कोई आर्कषण नहीं दिखा। उन्होंने एक दिन मुझसे कहा, ‘इस समय हम परिवार के साथ रहना चाहते हैं, और कहीं नहीं।’ और वे चले गए।

जब मैं आसपास देखता हूं तो वे अकेले नहीं हैं जिन्होंने यह बड़ा कदम उठाया। कई महीनों की थोपी गई स्थिरता, बड़े फैसले लेने की अक्षमता या तय जीवनशैली पर चलने के बाद, मेरी जान-पहचान के कई लोगों ने अचानक जीवन में बड़ा बदलाव किया, खासतौर पर मेरे शहर से बाहर जाने का। इस नए ट्रेंड से मुझे डॉ रेगी जॉर्ज और डॉ ललिता रेगी की कहानी याद आई, जिन्होंने ऐसा कदम 1993 में उठाया था। तब केरल के इस युवा डॉक्टर दंपति ने तमिलनाडु के सित्तिलिंगी में झोपड़ी में एक हॉस्पिटल शुरू करने का फैसला लिया, जब यह जगह धूल भरी थी और नजदीकी अस्पताल 50 किमी दूर था, साथ ही शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 में 147 थी।

मदुरै के गांधीग्राम में काम करने के दौरान उन्हें समझ आया कि कई मरीज डायरिया जैसी आसानी से ठीक होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए भी दूरदराज से आते हैं। उन्हें महसूस हुआ कि स्वास्थ्य सेवा हॉस्पिटल में मेडिकल केयर से भी परे जाती है। जब उनकी उम्र के डॉक्टर कॅरिअर के लिए बड़े शहर जा रहे थे, यह दंपति ऐसी जगह काम करना चाहता था, जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत हो। रेगी को भारत के दूरदराज इलाकों में काम कर रहे एनजीओ और संगठनों तक जाने के लिए फेलोशिप मिली। ट्रिप के अंत में उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों में काम करने का फैसला लिया, जो राज्यों की निरपवाद सीमाएं थीं। आमतौर पर ऐसी जगह भौगोलिक रूप से अलग-थलग होती थीं और वहां मुश्किल से कोई सुविधा या सरकार मौजूद होती थी। दंपति सित्तीलिंगी घाटी में अपने नवजात बच्चे के साथ रहने लगे। एक झोपड़ी में अस्पताल, ‘ट्रायबल हेल्थ इनिशिएटिव’ की शुरुआत थी, जो अब लोगों के जीवन में गहरा उतर गया है। बाद में जनजातीय लोगों द्वारा ईंट-ईंट जोड़कर अस्पताल बनाया गया। दंपति ने उन्हें भोजन के लिए मोटा अनाज उगाने के लिए प्रोत्साहित किया। नतीजतन लॉकडाउन में सित्तीलिंगी में कोई भी अस्वस्थ नहीं रहा और अब कमाई के लिए हल्दी ऊगा रहे हैं।

फिलहाल, 15000 लोगों के समुदाय में करीब 4000 किसान हैं, जिनमें से 500 ऑर्गनिक फार्मिंग कर रहे हैं। सित्तीलिंगी ऑर्गनिक फार्मर्स एसोसिएशन का गठन 2008 में हुआ, जो किसानों को जैविक खेती सिखाता है और फसल बेचने में मदद करता है। यहां की हल्दी यूरोपीय देशों में निर्यात हो रही है। वे हाल ही में मीडिया में चर्चा में रहे, जब उनके हल्दी पाउडर को 500 ग्राम की सजावटी शीशियों में बंदकर, हैदराबाद की एक शादी में बतौर रिटर्न गिफ्ट बांटा गया। इस तरह किसानों के लिए व्यापार के नए रास्ते खुल रहे हैं, साथ ही डॉक्टर दंपति को इम्यूिनिटी बेचने की नई गतिविधि मिल रही है।

फंडा यह है कि यह अपने जुनून को दूरदराज के इलाकों में ले जाने का सही समय है, जहां काम करने और रहने की लागत कम हो, ताकि यह भविष्य का पेशा बने।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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