अपने पेशे से जुड़ी छोटी-छोटी चीजें जानना बहुत जरूरी है और यही आपको परफेक्ट पेशेवर बनाती हैं

आज के कॉलम की शुरुआत मैं एक सवाल से करता हूं। एक मकड़ी को जाल बुनने में कितना समय लगता है? क्या इस सवाल से आपके चेहरे पर चंचल मुस्कान आई? आप सोच रहे होंगे कि ‘यह कैसा बेवकूफाना सवाल है?’ है न? इस सवाल का जवाब देने से पहले एक कहानी बताता हूं। यह एक यूएस मरीन की कहानी है, जो दूसरे विश्व युद्ध में लड़ा था। मरीन एक पेसिफिक आइलैंड पर अपनी यूनिट से बिछड़ गया।

जंगल में अकेले भटकते हुए वह दुश्मनों को अपने करीब आते सुन सकता था। छुपने की जगह ढूंढते हुए उसे एक टीले पर पत्थरों के बीच कई छोटी गुफाएं मिलीं। वह जल्दी से एक गुफा में घुस गया। लेकिन उसे अहसास हुआ कि अगर दुश्मन सैनिक उसे तलाशते हुए गुफाओं की तलाशी लेंगे तो वह मारा जाएगा। वहां उसने देखा कि एक मकड़ी गुफा के मुहाने पर जाल बुनने लगी। मरीन मकड़ी को परत-दर-परत जाल बुनते देख रहा था और उसे ढूंढते हुए दुश्मनों की आवाजें भी सुनाई दे रही थीं।

दुश्मन जैसे-जैसे करीब आए, वह अपनी गुफा के अंधेरे में से उन्हें एक-एक गुफा की तलाशी लेेते देख सकता था। जैसे ही वे उसकी तरफ आए, वह अपना आखिरी कदम उठाने को तैयार हो गया। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, उसकी गुफा की तरफ एक नजर देखने के बाद दुश्मन चले गए। अचानक मरीन को अहसास हुआ कि गुफा के द्वार पर मकड़ी का जाल होने के कारण उसकी गुफा ऐसी लग रही थी, जैसे वहां काफी समय से कोई आया ही नहीं। इस तरह वह यह कहानी बाद में अपनी रेजीमेंट को बताने के लिए जिंदा रहा। अगर दुश्मन जानता कि एक औसत मकड़ी को एक विस्तृत जाल बनाने में करीब एक घंटा लगता है, तब शायद मरीन नहीं बचता। मकड़ी दिनभर जाल को हुआ नुकसान सुधारती रहती है, इसलिए हमेशा ऐसा लगता है कि वह जाल बुन रही है।

मुझे यह कहानी तब याद आई जब मैंने बुधवार को पढ़ा कि तमिलनाडु राज्य स्वास्थ्य विभाग ने लोक निर्माण विभाग से कहा है कि वह बड़े अस्पतालों के शौचालयों तक ऑक्सीजन पाइप बिछाने की तैयार करे। इस सोमवार चेन्नई के राजीव गांधी गवर्नमेंट जनरल हॉस्पिटल और मदुरई के राजाजी गवर्नमेंट जनरल हॉस्पिटल ने अपने अस्पतालों के शौचालयों के बाहर ऑक्सीजन सिलेंडर रख दिए हैं। उनके मरीजों से शौचालय इस्तेमाल करने से पहले और बाद में ऑक्सीजन इस्तेमाल करने को कहा जा रहा है। वहां एक कुर्सी है, जिसपर उन्हें शौचालय इस्तेमाल करने के बाद बैठने कहा जाता है। न सिर्फ अपने अस्पताल में, बल्कि सरकारी अस्पतालों में भी ऐसी सुविधा (ऑक्सीजन पाइप्स) की अनुशंसा से पहले दोनों अस्पताल अध्ययन करेंगे कि इसका मरीजों पर क्या असर है। उन्होंने देखा कि ऑक्सीजन की कमी वाले मरीज, जिनकी सेहत सुधर रही थी, शौचालयों में गिर रहे थे। वे वॉर्ड में अच्छे थे, लेकिन शौचालय जाते समय उनका ऑक्सीजन स्तर अचानक गिर रहा था। ये सभी उम्र वर्ग में हो रहा था। अब वे अन्य सरकारी अस्पतालों के कोरोना आइसोलेशन वॉर्ड्स की केस शीट्स का अध्ययन कर रहे हैं। ऐसे नतीजे ‘विवादास्पद’ लगते हैं लेकिन कई बार बड़ी मदद कर सकते हैं। साथ ही छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान देना किसी भी पेशे में जरूरी है। जैसे अगर दुश्मनों ने मकड़ी के जाल पर ध्यान से सोचा होता तो नतीजा कुछ और होता।

फंडा यह है कि अपने पेशे से जुड़ी छोटी-छोटी चीजें जानना बहुत जरूरी है और यही आपको परफेक्ट पेशेवर बनाती हैं।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

Leave a Reply