अब गरीब से लेकर अमीर तक हर कोई धीरे-धीरे ‘उद्देश्यपूर्ण जीवन’ की ओर रुख कर रहा है, जो कि सिर्फ जीने से कहीं अलग है

हर पहल के पीछे एक मकसद होता है। अधिकांश लोगों का उद्देश्य जीवनयापन के लिए खर्च निकालना या अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए मुनाफा कमाना होता है। वहीं कुछ अपने जीवन को बेहतरी की दिशा में बढ़ाने में सक्षम होते हैं! यहां इसके उदाहरण हैं।

पहला उदाहरण : सूरत स्थित वराछा को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड के कर्मचारी अगर रोज साइकिल से दफ्तर आते हैं, तो बैंक ने उन्हें इंसेंटिव देना शुरू कर दिया है। ‘साइकिल टू वर्क अभियान’ से दफ्तर केे 4-5 किलोमीटर दायरे में रहने वाले कर्मचारी ऑफिस आने में साइकिल का प्रयोग करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। बैंक ने ऐसे कर्मचारियों को 500 रुपए प्रतिमाह इंसेंटिव देना शुरू किया है।

छोटे दरजे के कर्मचारियों के लिए 500 रु. प्रति माह एक आकर्षण हो सकता है, पर इस मुहिम के प्रति वरिष्ठ कर्मचारियों के आकर्षण की वजह है कि यह उन्हें फिट और हेल्दी रख रहा है। दोनों तरफ 30 मिनट की साइक्लिंग उतने घंटे की वॉक से कहीं ज्यादा है, जो कि महामारी के कारण प्रभावित हो गई थी। कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधन का मकसद साफ है- अच्छा स्वास्थ्य!

दूसरा उदाहरण : आर्किटेक्चर की डिग्री मिलने के बाद उमर फारुक मदुरै, तमिलनाडु में अपने घर के पास के रेस्तरां, होटल और घरों की डिजाइनिंग में व्यस्त था। कॉलेज के दिनों से ही उसके मन में पर्यावरण की मदद करने की इच्छा थी। पिछले कुछ महीनों में जब कोविड ने उसे घर में कैद कर दिया, तब 25 साल के उमर ने जहां भी बेकार टायर्स मिले, उन्हें इकट्‌ठा करना शुरू कर दिया और इन्हें घड़ी, आइना, अग्नि शमन यंत्र होल्डर, खेल के मैदान का सामान जैसे झूले, स्लाइडस, सीसॉ, फर्नीचर जैसे टेबल-कुुर्सी, सोफा सेट्स और विभिन्न आकार के गमलों में बदल दिया। चूंकि सड़कें, बाजार और व्यापार सब मंदे थे, ऐसे में उमर को महसूस हुआ कि अपने सपनों को हकीकत में बदलने का यही सबसे सही समय है।

अब ग्राहक ना सिर्फ उसके बनाए उत्पाद खरीद रहे हैं, बल्कि नए आडियाज़ जैसे पंचिंग बैग और फूलदान बनाने के ऑर्डर भी दिए हैं। उसे महसूस होता है कि जीवनयापन के अलावा उसके बिजनेस का एक मकसद भी है।

तीसरा उदाहरण : बिल्कुल एक साल पहले 25 सितंबर 2019 को पुणे के नजदीक कात्रज के कुछ हिस्सों में भारी बारिश के चलते आई बाढ़ से 26 लोगों की जान चली गई थी और संपत्ति को भी नुकसान हुआ था। इसका मुख्य कारण था कि कात्रज लेक से पानी ओवरफ्लो होने की चेतावनी नगर निगम समय पर जारी नहीं कर सका था। इसके बावूजद सालभर बाद भी निगम ने लेक के जलस्तर पर नजर रखने के लिए एक भी व्यक्ति को तैनात नहीं किया, जबकि अभी भी भारी बारिश हो रही है।

पर स्थानीय लॉन्ड्रीमैन 38 वर्षीय राकेश बोराडे ने इस पर अकेले नजर रखने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले रखी है, अपनी जान जोखिम में डालकर वह बार-बार आने वाली इस आपदा और स्थानीय लोगों के बीच ढाल बनकर खड़ा है। वह बिना चूके लेक की दीवारों पर गश्त करते हुए देखता रहता है कि जलस्तर ठीक बना है या नहीं। दूसरे रहवासियों और आसपास की सोसायटी के गार्ड्स की मदद से वह वहां रखी चाबी से झील के बड़े वाल्व गेट को हाथ से खोलता-बंद करता है, इसके लिए स्थानीय लोगों के साथ नेता भी उसकी तारीफ कर रहे हैं।

फंडा यह है कि नए चलन में गरीब से लेकर अमीर तक हर कोई धीरे-धीरे ‘उद्देश्यपूर्ण जीवन’ की ओर रुख कर रहा है, जो कि सिर्फ जीने से कहीं अलग है!

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