अब फैसला लेने का समय आ गया है कि हम हमारे दादा-दादी, नाना-नानी की भोजन की आदतें अपनाएं

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘जो थाली में है वही खाना पड़ेगा।’ मैं यह कथन कभी नहीं भूल पाऊंगा क्योंकि बड़े होते हुए मैंने यह हर जगह सुना। फिर वह मेरा घर हो या नाना-नानी, दादा-दादी का। हमें सुबह 7.30 बजे ब्रेकफास्ट, दोपहर 12.30 बजे लंच और शाम 5.30 बजे डिनर मिलता था और फिर रसोई बंद कर देते थे।

स्नैकिंग (बीच-बीच में नाश्ता) तो सुना ही नहीं था। और पोंगल व दीपावली जैसे त्योहार छोड़कर, बाकी पूरे साल ब्रेकफास्ट में ‘पयड़दु’ (बासी चावल पानी में भिगोकर फिर दही में मिलाकर, तड़का लगाकर, अचार के साथ परोसे जाने वाले व्यंजन के लिए तमिल शब्द) मिलता था। ‘पयड़दु’ की कहानी पीढ़ियों से सुनाई जा रही है और उतनी ही पुरानी है, जितना यह विषय है। आमतौर पर हमारे घरों में अतिरिक्त चावल बनता ही है, ताकि मेहमान आने पर तुरंत न बनाना पड़े। इसीलिए पयड़दु चलन में आया। इसका काफी परंपरागत फॉर्मूला है। रात का बचा हुआ पका चावल पानी में भिगोकर रख दें। अगले दिन सुबह चावल से पानी को अलग करें, पर इसे फेंके नहीं। फिर इन दोनों में अदरक (पेट की परेशानी ठीक करता है) और कड़ी पत्तों (इसमें सप्लीमेंट होते हैं) के साथ तिल (यह दिल और शरीर ठंडा रखता है) के तेल का अलग-अलग तड़का दें।

आप दही के साथ चावल खा सकते हैं या तड़के वाला पानी पी सकते हैं। फिर मैंने उन्हें रोजाना ऐसा भीगा चावल खाने के अमेरिकन न्यूट्रिशन एसोसिएशन (एएनए) द्वारा बताए गए फायदे गिनाए। एएनए कहता है, ‘यह शरीर को हल्का और ऊर्जावान रखता है, थकान कम लगती है, शरीर में लाभकारी बैक्टीरिया पैदा होते हैं, पेट की तकलीफें खत्म होती हैं, शरीर की हानिकारक गर्मी बेअसर होती है। चूंकि यह फाइबरयुक्त है, इसीलिए कब्ज और शरीर की सुस्ती खत्म करता है।

इससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित और हायपरटेंशन कम होता है, एलर्जी से होने वाली समस्याएं और त्वचा की बीमारियां कम होती हैं, शरीर से छाले कम होते हैं। इससे नए संक्रमण नहीं होते, साथ ही युवा दिखने में मदद मिलती है।’ एएनए ने बताया कि इसे खाने से चाय-कॉफी की इच्छा कम होती है, इसमें भरपूर विटामिन बी12 होता है। इसलिए बचे हुए चावल कभी फेंके नहीं। यह बेहद स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता है।’ अमेरीकियों को इसपर इतना विश्वास है कि साल 2009 से एक स्टार्टअप 9 डॉलर में एक लीटर ‘पयड़दु’ बोतल में ‘मॉर्निंग राइस’ नाम से बेच रहा है। इस शुक्रवार ‘पयड़दु’ पर मेरा विश्वास और मजबूत हो गया, जब मैंने सुना कि तमिलनाडु स्वास्थ्य विभाग 2.7 करोड़ रुपए की लागत से प्रोजेक्ट शुरू कर रहा है, जो क्रोन रोग और अल्‍सरेटिव कोलाइटिस जैसी इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिसीज (आईबीडी-आंत में जलन/सूजन संबंधी बीमारियां) में फर्मेंटेड (खमीरयुक्त) चावल के प्रोबायोटिक्स के प्रभाव का अध्ययन करेगा।

तीन साल चलने वाले शोध में 600 मरीज शामिल होंगे। आईबीडी के इलाज में सामान्यत: स्टेरॉयड दवाएं, इम्यूनिटी दबाने वाली और कैंसर रोधी दवाएं तथा कभी-कभी सर्जरी इस्तेमाल होती है। हालांकि चेन्नई के स्टेनली मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल का सर्जिकल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग सर्जरी का रास्ता कम अपनाता है और मरीजों को कुछ सामान्य दवाओं के साथ फर्मेंटेड चावल खाने कहता है।

फंडा यह है कि हमारे लिए फैसला लेने का समय आ गया है कि हम हमारे दादा-दादी, नाना-नानी की भोजन की आदतें अपनाएं या फिर मौजूदा डाइट पर ही रहें। यहां तक कि विज्ञान भी मानता है कि हम बीते कल से कुछ सीख सकते हैं। आपका क्या मानना है?

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