आज हर कोई ऐसी जंग लड़ रहा है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते; हमें सिर्फ धैर्य, दयाभाव और सहानुभूति रखनी चाहिए

Management Funda By N. Raghuraman

इस शनिवार मैं कार में पीछे बैठा अपने लैपटॉप पर व्यस्त था। मेरा ड्राइवर अक्सर हॉर्न नहीं बजाता और हॉर्न बजाने वालों को रास्ता देता है क्योंकि वह जानता है कि मैं डिस्टर्ब होता हूं। अचानक मैंने सुना कि मेरा ड्राइवर चिढ़कर हॉर्न बजा रहा है क्योंकि उसके आगे की कार काफी धीमे चल रही थी और रास्ता नहीं दे रही थी। मैं अपना आपा खोने ही वाला था कि मैंने देखा कि कार के पीछे छोटा-सा लेबल (स्टीकर) लगा है: ‘फिजिकली चैलेंज्ड; प्लीज बी पेशेंट’ (दिव्यांग व्यक्ति; कृपया धैर्य रखें)। इससे में शांत हो गया।

मैंने ड्राइवर को समझाया लेकिन वह मुझसे सहमत नहीं हुआ। उसने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि वह दिव्यांग है और न ही कार ऐसी दिख रही है।’ मैंने उससे मजाक में कहा, ‘मैं ऑटोमोबाइल के बारे में तुम्हारी जीके की परीक्षा बाद में लूंगा, अभी हॉर्न बजाना बंद करो।’

कुछ मिनट बाद हमारे आगे जा रही कार दाएं मुड़ी और एक ढाबे पर रुकी। मैंने भी ड्राइवर से ब्रेक लेने को कहा। यह देख हमें आश्चर्य हुआ कि उस कार का ड्राइवर ‘दिव्यांग’ नहीं दिख रहा था। मेरा ड्राइवर मेरी ओर देखकर तपाक से बोला, ‘देखो साहेब, मैंने बोला था न?’ मैंने उसे यह भूलकर दो कप चाय का ऑर्डर देने को कहा। मैं अपनी टेबल साफ करवाकर वहां बैठा और देखा कि उस आदमी ने अपने दोनों हाथों में नाश्ता और चाय ली और सफाई की परवाह किए बगैर, मुझसे दो टेबल आगे, एक टेबल पर बैठ गया। वह कंधे और गर्दन के बीच फोन फंसाए बातों में मशगूल था, जो दृश्य भारत में आम है।

वह किसी को अपना दुखड़ा सुना रहा था। मुझे ऐसा लगा कि वह खुद को हारा हुआ मान रहा था। उस बीस मिनट की बात से मैं यही समझ पाया कि उसके किसी करीबी का कोरोना से देहांत हो गया है और इसी वजह से कुछ वित्तीय समस्याएं हैं, साथ ही उसकी नौकरी भी चली गई है। जब वह टेबल से उठा तो मैं उसकी तरफ देख मुस्कुराया और बोला, ‘अब जो भी होगा, अच्छा होगा’ और उसे मेरा तर्क बताया। जाते हुए उसने मुझसे दिलासा चाहा, ‘सर, आपको पक्का यकीन है कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। ‘बेशक’, मैंने बस इतना ही कहा। उसने हाथ हिलाते हुए धन्यवाद कहा।

मैंने उसे ढाबे से जाते हुए देखा। मैं देख सकता था कि उसकी चाल में फुर्ती आ गई थी और उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ लग रहा था। चूंकि मेरा ड्राइवर इंतजार कर रहा था, इसलिए मैं गाड़ी में बैठा और आगे बढ़ा। हम शायद आधा किमी ही गए होंगे कि वही आदमी पहले से कहीं ज्यादा तेज गाड़ी चलाते हुए हमसे आगे निकल गया। मेरे ड्राइवर ने कहा, ‘अब क्या हुआ, अब क्यों इतनी तेज चला रहा है?’ मैं मुस्कुराते हुए बोला, ‘शायद उसे गर्म चाय की प्याली की जरूरत थी।’

बाद में मैंने खुद से सवाल पूछा, ‘क्या हम लोगों के प्रति तभी अधिक धैर्यवान और दयावान होंगे, जब हम उनकी कार, शर्ट या माथे पर लेबल चिपका हुआ देखेंगे? उनमें से कितनों की लेबल चिपकाने की हिम्मत होगी, जैसे ‘नौकरी चली गई’ या ‘कोविड से लड़ रहा हूं’ या ‘तलाक को लेकर परेशान हूं’ या ‘भावनात्मक हिंसा का शिकार हूं’ या ‘किसी अपने को खो दिया है’ या ‘लगता है मेरा कोई मोल नहीं’ या ‘आर्थिक रूप से टूट चुका हूं’ और ऐसे ही बहुत सारे।’

फंडा यह है कि हर कोई ऐसी जंग लड़ रहा है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। हम सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि धैर्य, दयाभाव और सहानुभूति रखें, क्योंकि हमारे आस-पास कई अदृश्य लेबल हैं।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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