आपके पास किसी तरह की सत्ता है, तो गरीबों पर दया करें और उन्हें वह बदलाव देखने में मदद करें जो सत्ता उनके लिए कर सकती है

एक सितंबर को सुबह 9 बजे मैं तीन अन्य पैनलिस्ट के साथ दैनिक भास्कर के रेडियो ‘माय एफएम’ के लिए एक कार्यक्रम कर रहा था, जिसका विषय था, ‘अनलॉक 4 की शुरुआत आज से, पर देश में इकोनॉमिक अनलॉक होना कब से शुरू होगा।’ एक श्रोता राजेश तिवारी ने रेडियो जॉकी मीनाक्षी को ट्वीट किया कि ‘प्लीज पैनलिस्ट से पूछिए कि तब क्या करें जब आवश्यक वस्तुओं पर एमआरपी न लिखी हो और विक्रेता यह कहकर ज्यादा कीमत पर बेचे के लॉकडाउन की वजह से दाम बढ़ गया है?’

यह खूबसूरत सवाल सभी के मन में है और मैं इसका जवाब एक कहानी से देना चाहता हूं। अप्रैल 20, 2019 को 33 वर्षीय श्रुति समीर मांजरेकर मुंबई में अपने दो बच्चों के साथ लोकल ट्रेन में बैठी। मुंबई के किसी भी यात्री की तरह उसने ट्रेन में चढ़ने से पहले 35 ग्राम वजनी और 1.75 लाख रुपए कीमत का नया मंगलसूत्र और अपनी घड़ी बैग में रख ली। लेकिन बच्चों के साथ उतरने की जद्दोजहद में वह बैग ट्रेन में ही भूल गई।

श्रुति ने रेलवे जीआरपी से संपर्क किया, जिन्होंने ट्रेन के आखिरी स्टेशन पर पहुंचने पर छानबीन की, लेकिन उन्हें बैग नहीं मिला। वे शिकायत दर्ज करना नहीं चाहते थे। उन्होंने सीसीटीवी फुटेज जांचे फिर भी कुछ नहीं मिला। श्रुति ने तब अपने ज्वेलर को जानकारी दी, जिससे उसने ईएमआई पर मंगलसूत्र खरीदा था। उसने कहा कि मंगलसूत्र खोने के बावजूद वह पेमेंट करती रहेगी। पिछले 16 महीनों से वह अपना वादा निभा रही है। हालांकि, उसे अब मंगलसूत्र मिलने की उम्मीद नहीं है। एक तरफ कई लोगों को 30 साल से अपनी खोई हुई मूल्यवान चीजें नहीं मिलीं, वहीं जीआरपी के पास वर्षों से करीब 17,000 चीजें ऐसी थीं जिनपर किसी ने दावा नहीं किया।

लेकिन हाल ही में स्थिति बदली है। इस शनिवार एक ज्वेलर को जीआरपी के स्पेशल सेल के अधिकारी का फोन आया, जिसने बताया कि उन्हें एक डिब्बा मिला है, जिसपर उसकी दुकान का नाम है और पूछा कि क्या उसे मालिक का नाम याद है। यह सोचकर कि यह श्रुति का मंगलसूत्र हो सकता है, उसने श्रुति का पता दिया। ऐसा श्रुति के साथ ही नहीं हुआ, बल्कि स्पेशल सेल पिछले 14 महीनों में 10 करोड़ से ज्यादा कीमत की करीब 13,000 मूल्यवान चीजें उनके मालिकों तक पहुंचा चुकी है।

इनमें से कुछ दशकों पहले चोरी हुई थीं और कुछ लंबित अदालती कार्यवाहियों से फंसी हैं। जब स्पेशल सेल की स्थापना हुई थी, तब उनके पास 17 हजार बिना दावे वाली चीजें थीं, अब करीब 4000 ही बची हैं। कल्पना कीजिए कि उन्हें कैसा महसूस होता होगा जिन्हें ऐसे समय में खोई हुई लाखों की चीज मिल गई, जब उनमें से कुछ की नौकरी चली गई है, या महामारी के कारण उन्हें वेतन नहीं मिल रहा है। उनकी भावना, ईश्वर के प्रति उनका आभार और खाकी वर्दी वालों के लिए बढ़े सम्मान को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

राजेश को मेरा जवाब यह है कि उनकी शिकायत ऐसा अकेला मामला नहीं है। गरीब इस नए घोटाले से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जिसे मुझे एक और वायरस कहने में कोई डर नहीं है। सत्ता में मौजूद लोगों को लालच से बने इस वायरस का हल निकालना होगा, जैसे स्वास्थ्य अधिकारी कोरोना का निकाल रहे हैं।

फंडा यह है कि अगर आपके पास किसी तरह की सत्ता है, तो गरीबों पर दया करें और उन्हें वह बदलाव देखने में मदद करें जो सत्ता उनके लिए कर सकती है। विश्वास कीजिए, आपको भी खुद पर गर्व होगा।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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