आपके भीतर एक हुनर ऐसा हो जो दूसरों की मदद करने के काम आ सके

रविवार को मैंने सुबह चार बजे नासिक की ओर ड्राइविंग शुरू की। सूरज उगने के काफी पहले मैं इगतपुरी में पड़ने वाले घाट पर पहुंच गया और अचानक अंधेरे में दो महिलाओं सहित चार लोगों के परिवार को घाट के बीचोबीच मदद के लिए वाहनों को रोकने की कोशिश करते देखा। मैं रुका तो उन्होंने गुजारिश की कि आगे कोई मैकेनिक देखकर उसे यहां टायर बदलने के लिए भेज दीजिए। मैं नीचे उतरा और उनकी मदद की, क्योंकि यह मेरे उन शुरुआती सबकों में से था, जो मेरे ड्राइविंग इस्टीट्यूट ने मुझे उन वर्षों में दिया था जब मेरे पास कार नहीं थी। इंस्टीट्यूट के मालिक एक पारसी सज्जन थे, जिन्होंने मुझे एक बात बहुत स्पष्टता से कही, ‘मैं युवाओं को आपातकाल में खुद को बचाने के काम की चौपहिया या दोपहिया वाहनों की बुनियादी बातें सिखाने के पहले ड्राइविंग नहीं सिखाता और ड्राइविंग के पेशे में किसी न किसी दिन आपात स्थिति आती ही है।’ विश्वास मानिए कि 20 मिनट की उस छोटी-सी मदद के बाद मेरे दिल में नासिक पहुंचने तक ऐसी खुशी थी, जिसे बयां नहीं किया जा सकता।
इससे मुझे याद आया कि महाराष्ट्र के सांगली शहर में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ में 15 हजार लोगों की ज़िंदगियां बचाने में मदद करने वाले रॉयल कृष्णा बोट (आरकेबी) के सदस्यों को कितनी खुशी महसूस हुई होगी। पश्चिमी महाराष्ट्र पर वर्षा ने जो कहर ढाया और नदियां खतरे के निशाने से काफी ऊपर उफनने लगी, उससे सांगली शहर अब भी उबरने की कोशिश कर रहा है। लगभग 70 फीसदी शहर पांच दिनों तक पानी में डूबा रहा। अब जब जलस्तर नीचे उतरने लगा है तो अपने पीछे भारी मात्रा में गाद और कीचड़ छोड़ रहा है, जिससे पूरा शहर उजाड़ नज़र आ रहा है। आज लोगों का पूरा ध्यान अपने मकानों के पुनर्निर्माण पर है, लेकिन वे नौकायन में अपनी महारत के लिए पहचान बनाने वाले आरकेबी क्लब को वे कभी नहीं भूल सकते।
3 अगस्त को सांगली में पानी बढ़ने लगा, क्योंकि वहां आपस में मिलने वाली कृष्णा और वारना नदियां उफन रही थीं। वहां से सिर्फ सिर्फ दस किलोमीटर दूर अपनी नदी घाटी में कृष्णा अधिकतम चौड़ाई में फैल गई थी। उस इलाके में 8 हजार लोग रहते हैं। 2005 में भी सांगली को बाढ़ का सामना करना पड़ा था पर इस बार तो सैलाब ने हर सीमा पार कर ली थी। क्लब में 16 साल से ज्यादा समय से कोच दत्ता पाटिल ने जब जलस्तर को बढ़ते देखा तो अपने सारे प्रशिक्षुओं को बुला लिया। चूंकि वे शहर को अच्छी तरह जानते थे और लोगों तक तेजी से पहुंच सकते थे तो सारी चीजें जल्दी से हो गईं। बाद में उन्होंने छोटी टीमें बनाईं व बाढ़ के पानी में से तैरकर गए, क्योंकि पर्याप्त संख्या में नौकाएं नहीं थीं और इस तरह अधिकारियों के पहुंचने के पहले किसी तरह कई लोगों को बचाने में कामयाब रहे।
पचास सदस्यीय (ज्यादातर मध्यवर्गीय ग्रामीण घरों के लोग) क्लब के पास बचावकार्य के लायक उपकरणों की भारी कमी थी। क्लब के सदस्यों ने अपनी 20 नौकाओं का इस्तेमाल न सिर्फ लोगों को बचाने, खाने के पैकेट व दवाइयां बांटने में किया बल्कि बचाव अधिकारों का मार्गदर्शन करने में भी किया। इन अज्ञात नायकों ने लगातार 12 दिनों तक काम किया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारी बाढ़ के बावजूद सांगली में कोई हताहत न हो।
कोई आश्चर्य नहीं कि महाराष्ट्र सरकार ने लोक स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को कई जिलों के दुख व तनाव से गुजर रहे बाढ़ पीड़ितों की काउंसिलिंग के लिए तैनात किया है ताकि बेघर, बेरोजगार होने के अलावा बाढ़ में अपने परिजनों को खोने से दुखी लाखों लोगों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान दिया जा सके। इस तरह उन्हें तनाव संबंधी उन गड़बड़ियों से बचाया जा सके, जिनसे ऐसे पीड़ितों के शिकार होने की आशंका रहती है।
फंडा यह है कि यदि आपका कोई एक शौक, एक हुनर, कोई अंशकालीन पेशा कम से कम संकट के समय किसी की मदद कर सकें तो आप हमारे समाज में किसी के लिए सहायक हो सकते हैं। आपके काम पर किसी का ध्यान जाए या न जाए पर एक बात तय है कि इससे आपको अवर्णनीय संतोष प्राप्त होगा

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