आपके लक्ष्य का कोई न कोई उद्देश्य होता ही है, लेकिन कभी-कभी उसे पाने के लिए परेशान न हों

अगर आप इस रविवार किसी खूबसूरत पगडंडी पर हाइकिंग (पैदल यात्रा) कर रहे हैं, खासतौर पर बारिश के खूबसूरत मौसम में, जहां हर तरफ हरियाली है, क्या आप चाहेंगे कि मंजिल पर पहुंचकर सफर खत्म हो जाए? या फिर हरियाली के बीच, ठंडी बयार महसूस करते हुए, अनजाने-अनदेखे पक्षियों की चहचहाहट के साथ चलते रहना पसंद करेंगे? क्या आप मंजिल करीब आती देख, अचानक रास्ता बदलकर किसी और दिशा में नहीं चलने लगेंगे? ऐसे में क्या आप पर अपना लक्ष्य अक्सर बदलने का आरोप लगेगा? बेशक नहीं! ऐसा इसलिए क्योंकि आपको चलने की प्रक्रिया में आनंद आ रहा है। अगर आप इस तर्क से सहमत हैं तो ये कहानियां पढ़ें।

पहली कहानी: अमेरिका निवासी आलोक राठौर इस साल मार्च में अपनी सास की पुण्यतिथि के लिए मुंबई आए थे और तब से वहीं फंसे हैं। हम सभी की ही तरह प्रवासी मजदूरों, स्थानीय लोगों की नौकरियां जाने समेत विभिन्न मुद्दों ने उनका ध्यान खींचा। उन्होंने मई में आम खाद्य सामग्री वाली थाली और पानी की बोतलें बांटना शुरु किया। यह महसूस होने पर कि उनके संसाधन एक सीमा के बाद खत्म होने लगेंगे, उन्होंने जरूरतमंदों की मदद के लिए ‘rotisabzi4raahi’ (रोटी सब्जी 4 राही) नाम के अभियान के तहत फंडरेजिंग प्लेटफॉर्म की मदद से डोनेशन मांगना शुरू किया।

उन्होंने इस पहल के बारे में बताते हुए अपना एक वीडियो डाला। जल्द करीब 5 लाख रुपए इकट्‌ठे हो गए, जो अब 512 दानदाताओं की मदद से 45 लाख रुपए तक पहुंच गए हैं। उन्होंने करीब 1700 परिवारों को महामारी के दौरान खाना खिलाया और कई जरूरतमंद परिवारों को जरूरी सामान पहुंचाया। अब आलोक की बड़ी योजना है, वंचित बच्चों के लिए शिक्षा। लेकिन 5 सितंबर, शिक्षक दिवस के दिन वे अमेरिका लौट जाएंगे। पर उनके द्वारा शुरू किया गया अभियान, वे वहीं से चलाते रहेंगे, जबकि उनका परिवार व स्वयंसेवकों का छोटा समूह मुंबई में मौजूद रहकर काम करता रहेगा।

दूसरी कहानी: सिलिगुड़ी (प. बंगाल) में अनिर्बान नंदी और उनकी पत्नी पौलमी चाकी ने ग्रामीण इलाकों में विकास व अर्थव्यवस्था पर सर्वे किया था। उन्हें पता चला कि गरीब जो भी खाना मिलता है, उससे जैसे-तैसे गुजारा कर लेते हैं, लेकिन शिक्षा पर बुरा असर पड़ा है। ऑनलाइन क्लास के लिए गैजेट्स खरीदने में अक्षमता से लेकर बिजली-इंटरनेट की उपलब्धता में समस्या ने बच्चों की शिक्षा लगभग रोक दी है। आलोक की ही तरह इस दंपती ने भी कुछ दोस्तों-रिश्तेदारों से संपर्क करके 6000 किताबें इकट्‌ठा कीं।

किताबें कार में भरीं और चाय बागानों तथा गांवों में जाकर बच्चों से जितनी चाहें, उतनी किताबें लेने को कहा। लेकिन साथ में किताब 3 महीने में वापस करने की गारंटी भी मांगी। अब तक वे 30 गांवों, 16 चाय बागानों में जा चुके हैं और करीब 1600 छात्रों की मदद कर चुके हैं, जिनमें 80% लड़कियां हैं।

तीसरी कहानी: बंगाल के ही मालदा में एक डॉक्टर दंपती, जहांगीर आलम (चाइल्ड स्पेशलिस्ट) और एसआर नसरीन (गायनोकोलॉजिस्ट) को अहसास हुआ कि महामारी के कारण उन गरीबों की स्वास्थ्य देखभाल आखिरी प्राथमिकता हो गई है, जिनकी आजीविका छिन चुकी है। इसीलिए दंपती ने मेडीकल कैंप्स आयोजित करने का पैसला लिया। अब तक दंपती ईंट भट्‌टी और बीड़ी फैक्टरी के मजदूरों के लिए 25 फ्री हेल्थ चेक-अप आयोजित कर चुके हैं।

फंडा यह है आपके लक्ष्य का कोई न कोई उद्देश्य होता ही है, लेकिन कभी-कभी उसे पाने के लिए परेशान न हों। बल्कि उसके सफर और प्रक्रिया का आनंद लेने पर ध्यान दें।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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