आप किसी को ‘बेहद डर’ से आजादी दिला सकते हैं

पिछले शनिवार शाम 7.51 पर फेसबुक के आयरलैंड ऑफिस ने दिल्ली के सायबरक्राइम डीसीपी अन्येश रॉय से संपर्क किया और उन्हें एक भारतीय फेसबुक यूजर की आत्महत्या की प्रवृत्ति की जानकारी दी व एकाउंट से जुड़ा फोन नंबर दिया। यूजर ने एक वीडियो पोस्ट कर आत्महत्या करने की बात कही थी। पुलिस ने तुरंत उस नंबर पर संपर्क किया लेकिन उसका इस्तेमाल उसकी पत्नी कर रही थी, जबकि फेसबुक एकाउंट यूजर इस्तेमाल कर रहा था। दरअसल पत्नी झगड़े के बाद दो हफ्ते पहले घर छोड़कर चली गई थी। उसने पति का मोबाइल नंबर दिया लेकिन उसे नहीं पता था कि वह मुंबई में कहां रहता है। दिल्ली पुलिस ने मुंबई पुलिस की डीसीपी रश्मि करंदीकर को रात 9 बजे से पहले सारी जानकारी भेज दी। चूंकि यूजर का फोन बंद था इसलिए उससे संपर्क नहीं हो रहा था। फिर पता चला कि वह वॉट्सएप पर सक्रीय है।
चूंकि वह शेफ था, इसलिए पुलिस ऑफिसर ने उससे पेशेवर काम के संदर्भ में संपर्क किया और उसे बातों में लगाए रहे। फिर शेफ ने बताया कि वह लॉकडाउन की वजह से तनाव से गुजर रहा है, उसकी नौकरी चली गई है और बीवी से झगड़ा हो गया है, वगैरह। ऑफिसर उसके मनोवैज्ञानिक तनाव की गहराई समझ सकता था और उसने उसे शिकायत करने और रोने का पूरा मौका दिया। उधर अन्य पुलिस टीम ने उसकी लोकेशन पता की और आधी रात से पहले वहां पहुंच गए, जहां वह अकेला रहता था। बाद में उसे काफी समझाया गया और परिवार को उसके सुरक्षित होने की जानकारी दी। इसी शहर में कुछ और डराने वाले आंकड़े हैं। जनवरी और जुलाई 2019 के बीच, पश्चिम रेलवे, मुंबई में पटरी पर 828 मौतें दर्ज की गईं, जिसमें 32 (3.86%) आत्महत्याएं थीं। इसी अवधि में इस साल पटरी पर होने वाली मौतें करीब 50% कम होकर 436 पर पहुंच गईं।
हालांकि इनमें से 43 (9.86%) बतौर आत्महत्या दर्ज हैं। वह भी तब, जब मार्च से नियमित ट्रेनें नहीं चल रही हैं। जब मैं ये दो कहानियां अपने एक सायकोलॉजिस्ट दोस्त को बता रहा था तो उसने मुझसे सीधा सवाल पूछा, ‘क्या आप जानते हैं कि यहां क्या काम आया?’ और उसने अपने ही सवाल का जवाब दिया, ‘ज्यादातर बार उन्हें किसी सलाह की जरूरत नहीं होती, उन्हें बस कोई ऐसा चाहिए होता है जिससे वे खुलकर बात कर सकें। और पुलिसवाले ने फोन पर यही किया।’ जी हां, व्यक्ति के लिए उपलब्ध होना और उसकी बात सुनना ऐसे लोगों की मदद करता है।
अन्य सायकोलॉजिस्ट भी मानते हैं कि महामारी की वजह से कई लोगों को जीवन में अर्थ नहीं दिख रहा और उन्हें लगने लगा है कि उनका कोई महत्व नहीं है। उन्हें लगता है कि डर एक अनुकूल प्रतिक्रिया है, जिससे व्यक्ति जरूरी एहतियात बरतता है लेकिन जरूरत से ज्यादा डर का उलटा असर हो सकता है और इससे गुस्सा उत्पन्न होता है।
मुझे लगता है, समय आ गया है कि महामारी और लॉकडाउन की वजह से वित्तीय या अन्य संघर्ष झेल रहे लोगों को परामर्श देने के लिए राज्य सरकारें हेल्पलाइन शुरू करें। याद है,यह आइडिया कई युवा छात्रों की जान बचाने में कारगर रहा। साधारण भाषा में वे लोग खुद से संघर्ष में उलझे हुए हैं और उन्हें सहारा देने वाली एक आवाज चाहिए।
फंडा यह है कि जब आप किसी व्यक्ति के बारे में राय बनाए बिना, उसे सहारा देते हैं, तब आप उस व्यक्ति को सच्ची आजादी देते हैं, जो खुद से संघर्ष कर रहा है और हद से ज्यादा डर का गुलाम बन गया है।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु [[email protected]]

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