आप सुपरमैन तब बनते हैं, जब आप सफलता के चरम पर हों और वापस नीचे जाकर बाकी लोगों को भी सफलता तक पहुंचने में मदद करने का फैसला लेते हैं

Management Funda by N. Raghuraman

कुछ सुपरमैन एक तकनीक बनाकर कभी खुद उससे अकेले नहीं उड़ते। वे गोशाला जैसी जगह से भी कई गरीबों की तकनीक की मदद से उड़ने में मदद कर सकते हैं। हमारे देश में ऐसे कई सुपरमैन हैं, जिन्हें मैं जानता हूं और उनमें से एक को इस गुरुवार वैश्विक पुरस्कार पाकर पहचान मिली है।

उन्होंने चौथी कक्षा तक कम्प्यूटर नहीं देखा था, लेकिन एक बार मिलने के बाद वे उसमें डूब गए। दसवीं तक उन्होंने बेसिक कम्प्यूटर एप्लिकेशन पढ़े और फिर 12वीं में कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग पढ़ी। डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में मढा तालुका के परितेवाड़ी गांव के जिला परिषद प्राइमरी स्कूल में बतौर शिक्षक सरकारी नौकरी शुरू की। यहां पूरा पता देने का मकसद यह है कि गुरुवार को इस टीचर के सुपरटीचर बनने से पहले तक यह पता कोई जानता भी नहीं था।

यह सरकारी प्राथमिक स्कूल एक जीर्ण-शीर्ण इमारत में था, जो एक तबेले और गोदाम के बीच फंसी थी। इसमें बहुत कम छात्र थे। यहां न बिजली थी, न पीने का पानी और माता-पिता भी स्कूल की शिकायत नहीं करते थे। यह शिक्षक जानते थे कि अच्छी परिस्थिति वाले इलाके में काम कर सफलता पाना आसान है लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में काम कर सफल होने से बदलाव आता है। इस तरह उन्होंने काम शुरू किया।

उन्होंने पहले पैरेंट्स से बात की और उन्हें समझाया कि उनके बच्चों की जगह कक्षा में है, खेत में नहीं। फिर उन्होंने गोशाला को कक्षा में बदला। उन्होंने टेबल पर रखने वाला अंडाकार कम्प्यूटर बनाया जिसे उन्होंने 18 महीने बाद पेटेंट करवाया। लेकिन उन्हें अहसास हुआ कि बिना बिजली कम्प्यूटर बेकार है। उन्होंने अपने पिता से पैसे उधार लिए और एक लैपटॉप खरीदा।

चूंकि बच्चे स्कूल आने से पहले ही थक जाते थे इसलिए उन्होंने शुरुआती 3 महीनों के लिए बच्चों के साथ फिल्म देखने का फैसला लिया ताकि बच्चों की स्कूल आने में रुचि जागे। फिर धीरे-धीरे औपचारिक शिक्षा शुरू हुई। कम्प्यूटर उसका हिस्सा बन गए। उन्होंने उनकी रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाने का कौशल विकसित किया। जैसे सीखना, संवाद, अलोचनात्मक चिंतन, जानकारी की जांच, रचनात्मकता या जिन्हें हम 21वीं सदी के कौशल कहते हैं। इस तरह गांव के बच्चों की तकनीक की यात्रा शुरू हुई।

अब आते हैं 3 दिसंबर 2020 पर। प्राइमरी शिक्षक, 32 वर्षीय रणजीत सिंह डिसले ने दुनियाभर के 9 फाइनलिस्ट को पीछे छोड़ वार्षिक पुरस्कार जीता है, जिसे शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण योगदान देने वाले शिक्षकों को सम्मानित करने के लिए दुबई में रहने वाले भारतीय शिक्षा परोपकारी सनी वार्की ने 2014 में शुरू किया था। रणजीत ‘ग्लोबल टीचर प्राइज’ के लिए 140 देशों से आए 12,000 नॉमिनेशन और आवेदनों में से अंतिम 10 में चुने गए थे।

ग्लोबल टीचर प्राइज रणजीत का पहला पुरस्कार नहीं है। उन्हें 2016 में केंद्र सरकार ने इनोवेटिव रिसर्चर ऑफ द ईयर चुना और उन्होंने 2018 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन का इनोवेटर ऑफ द ईयर अवॉर्ड जीता। रणजीत ने 2019 में दुनियाभर के शिक्षकों के समक्ष ‘ग्लोबल पीस-बिल्डिंग प्रोग्राम’ पेश किया था। इस पहल को उसी साल पेरिस में माइक्रोसॉफ्ट एजुकेशन एक्सचेंज कार्यक्रम में पुरुस्कृत किया गया था।

सराहनीय बात यह है कि रणजीत ने गुरुवार को ‘ग्लोबल टीचर अवॉर्ड’ स्वीकारते हुए अपने भाषण में कहा कि वे अपनी इनामी राशि का 50 फीसदी अन्य फाइनलिस्ट के साथ साझा करेंगे, ताकि उन्हें उनके ‘शानदार काम’ में मदद मिल सके। यानी अन्य नौ फाइनलिस्ट में से प्रत्येक को 55 हजार डॉलर मिलेंगे।

फंडा यह है कि आप सुपरमैन तब बनते हैं, जब आप सफलता के चरम पर हों और वापस नीचे जाकर बाकी लोगों को भी सफलता तक पहुंचने में मदद करने का फैसला लेते हैं।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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