आभार का अर्थ सिर्फ कुछ देना ही नहीं है, बल्कि यह तो आपके आसपास की दुनिया के लिए आपकी मंशा और चिंता का नतीजा होता है

कई किलोमीटर पैदल जा रहे राहगीरों को पानी की बोतलें और चप्पलें देने से लेकर गरीबों को खाना देने और अब कई राज्यों में बेरहम बारिश में भीग रहे लोगों को रेन कवर्स देने तक, यह सब करने की हमसे उम्मीद थी। शायद यह हमारा अपने ईश्वर को धन्यवाद देने का तरीका था, जिन्होंने हमें वैसा बनाया, जैसे हम हैं। लेकिन हमारे बीच, गरीब से लेकर संपन्न तक, ऐसे लोग भी हैं, जो धीरे-धीरे और लगातार समाज को धन्यवाद देने, जरूरतमंदों और पीड़ितों की मदद करने का तरीका बदल रहे हैं।

डॉ जावेद शेख और उनकी पत्नी डॉ अंजुम शेख का उदाहरण ही ले लीजिए। कई अन्य डॉक्टरों की तरह ये दंपती पुणे में पिंपरी के कालेवाड़ी में पिछले चार वर्षों से मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल चला रहे हैं। जावेद ऑर्थोपीडिक है और अंजुम गायनोकोलॉजिस्ट। जावेद के पिता शायद समाजसेवा के दौरान कोरोना संक्रमित हो गए। घर में डॉक्टरों के होने और शहर के अन्य डॉक्टरों से अच्छा संपर्क होने के बावजूद, उन्हें पिता के लिए आईसीयू वेंटीलेटर बेड नहीं मिला और वे 17 जुलाई को वायरस का शिकार हो गए। उस इलाके में वाकई में कोविड केयर बेड्स की कमी थी।

बिना वक्त गंवाए दंपती ने सोचा कि उन्हें अपने ही अस्पताल में जल्द कोविड केयर बेड्स पर काम करना चाहिए, जो समाज के काम आएंगे और यह उनके पिता के लिए श्रद्धांजलि भी होगी। आज उनके अस्पताल में एक छत के नीचे 30 कोरोना मरीजों के इलाज की सुविधा है, जिसमें 12 ऑक्सीजन बेड और दो वेंटीलेटर बेड शामिल हैं। एक महीने से भी कम समय में बड़ा बदलाव लाने के लिए स्टाफ को समझाने और सहयोग के लिए मनाने से लेकर उपकरण लाने तक, यह दंपती का उस समाज को धन्यवाद देने का तरीका है, जिसने उन्हें वह बनाया, जो वे आज हैं।

एक और उदाहरण देखें। केवल 17 वर्ष की उम्र में कादर अली प.बंगाल में पूर्व मिदनापुर के सोनामोई गांव का अपना घर छोड़ नौकरी की तालश में मद्रास (अब चेन्नई) की ट्रेन में बैठ गया था। उसे वहां माहे (केरल) के एक व्यापारी से मिलने का मौका मिला, जिसने उसकी वहीं एक नए खुले होटल में नौकरी लगवा दी। कादर ने शुरुआत में उस होटल में हेल्पर का काम किया और फिर अन्य बार-होटल में मुख्य कुक बन गया, जहां उसने करीब 25 साल काम किया।

इन वर्षों में उसने कुछ पैसा कमाया, शादी की, अपने गांव में जमीन का टुकड़ा खरीदा और अपने दो बच्चों को शिक्षित किया। वह न सिर्फ अच्छे से मलयालम बोल सकता है, बल्कि उसने अपने शहर में कठहल, आम और सुपाड़ी के पेड़ लगाए हैं ताकि अपने बंगाली घर में उसे केरल के मालाबार जिले जैसा अहसास हो सके। उसने इतने वर्षों में अपने गांव के कई लोगों की केरल के कन्नूर और कोझिकोड में नौकरी भी लगवाई।

कादर अब 42 साल का है और लॉकडाउन की घोषणा के बाद अपने घर-गांव चला गया था। चूंकि वह काम पर वापस नहीं जा सकता, इसलिए उसने एक छोटा रेस्त्रां बनाया है और उस जगह के सम्मान में इसका नाम ‘माहे रेस्त्रां’ रखा है, जिसने उसकी वहां पहुंचने में मदद की, जहां वह आज है। साथ ही उसने उन साथी ग्रामीणों की मदद का फैसला भी लिया, जिनकी नौकरी चली गई है।

फंडा यह है कि आभार का अर्थ सिर्फ कुछ देना ही नहीं है, बल्कि यह तो आपके आसपास की दुनिया के लिए आपकी मंशा और चिंता का नतीजा होता है।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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