आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के सही इस्तेमाल से करिअर में मिल सकती है अच्छी स्थिरता

अगर आपकी रुचि टेक्नोलॉजी, खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) में है तो यह उदाहरण आपके लिए है। ग्वालियर की बीएसएफ एकेडमी के नेशनल डॉग ट्रेनिंग सेंटर से टिंकी नाम की जर्मन शेफर्ड को मुजफ्फरनगर में कॉन्सटेबल के पद पर नियुक्त किया गया था।

सूंघने की उसकी शानदार क्षमता के कारण उसे 6 साल में 6 पदोन्नति मिलीं और वह एएसपी तक बनी, जो किसी डॉग के लिए रिकॉर्ड है। पिछले नवंबर बीमारी की वजह से उसका निधन हो गया, लेकिन इससे पहले वह 49 अपराध सुलझा चुकी थी। इस सुपर पुलिस डॉग को श्रद्धांजलि देने के लिए मुजफ्फरनगर पुलिस ने इस शनिवार पुलिस लाइन में टिंकी की मूर्ति का अनावरण किया।

कुत्ते इंसान के सबसे अच्छे दोस्त हैं और मुढोल या रामपुर हाउंड, राजापालायम, चिप्पीपारई, कन्नी जैसी कई भारतीय नस्लें हमारी रक्षा में श्रेष्ठ साबित हो रही हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी देश की रक्षा में कुत्तों की अहम भूमिका पर बात की है। यही कारण है कि हमारी भारतीय पुलिस और रक्षा बल भी इन नस्लों को न सिर्फ अपराध सुलझाने में, बल्कि विस्फोटक सूंघने और कई कूटनीतिक महत्व के स्थानों में सुरक्षित दूरी बनाए रखने में इस्तेमाल कर रहे हैं।

लेकिन अब सियाचिन जैसे मुश्किल इलाकों में दुश्मन से लड़ने में सेना की मदद करने के लिए बेंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएस) डॉग्स की नई नस्ल बना रहा है। ‘आर्टपार्क’ (आईआईएस और एआई फाउंड्री का संयुक्त उपक्रम) द्वारा बनाई गई रोबोट नर्स ‘आशा’ की सफलता के बाद स्टॉच 2 (STOCH 2) कोडनेम वाला रोबोटिक डॉग आ रहा है। स्टॉच 2 एक चौपाया रोबोट है, जिसे ऊंचे इलाकों में सेना की सामान ढोने में मदद करने के लिए बनाया गया है। प्रोटोटाइप डिजाइन अभी ऊबड़-खाबड़ चढ़ाई पर सात किलो वजन तक ले जा सकती है।

प्रोजेक्ट से जुड़े लोग मानते हैं कि वे भविष्य में यह क्षमता पहले 20 और फिर 40 किग्रा तक ले जाएंगे। कुत्ते को सभी तरह के इलाकों में और तिरछा चलने के लिए भी तैयार किया जा रहा है। शोधकर्ता रोबोटिक डॉग की अन्य सैन्य ऑपरेशनों में इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं, ताकि वे कई जोखिम भरे कामों में इंसानों और जानवरों को शामिल करना कम कर सकें।

कहावत है कि ‘शांति के लिए हमें युद्ध की तैयारी करनी चाहिए’। हालांकि इस आधुनिक दुनिया में युद्ध की आशंका कम है, लेकिन हमें आतंकवाद का खतरा बना हुआ है। एआई वाली स्टॉच 2 जैसी मशीनें सैनिकों के लिए जरूरी जमीनी काम कर सकती हैं, जिससे सैकड़ों जिंदगियां बच सकती हैं।

बुद्धिमान मशीनें हमारी जिंदगी के हर पहलू को प्रभावित कर रही हैं और मुश्किल परिस्थितियों में जान बचाने के अलावा इंसानी क्षमताओं को बढ़ाकर कार्यक्षमता बढ़ा रही हैं। हमारे कार्यों में एआई का अब इतना दखल है कि आने वाले दिनों में उसके बिना जीने की कल्पना मुश्किल होगी।

एआई ऐसी तकनीक है जो मशीनों को सीखने की क्षमता देती है। माहौल को समझकर वह मशीन का व्यवहार बदल सकती है। उदाहरण के लिए क्लेवरबॉट एक बोलने वाला रोबोट है, जो लोगों से संवाद कर सकता है। उसकी प्रतिक्रियाएं प्रोग्राम्ड नहीं हैं। वह इंसानों से अतीत में की गई बातचीत और प्रतिक्रियाओं के आधार पर नया संवाद करता है।

ड्राइवरलेस कारों के अलावा एआई का कैंसर के इलाज में भी व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। चूंकि कैंसर की हर मरीज में अलग-अलग प्रकृति होती है, इसलिए एआई की मदद से डॉक्टर जल्दी उपयुक्त इलाज तैयार कर पाते हैं।

फंडा यह है कि एआई भविष्य है और अगर आप इसका इस्तेमाल जिंदगी बचाने जैसे महान मकसद के लिए करते हैं, तो आपको करिअर में अच्छी स्थिरता मिल सकती है।

Leave a Reply