इंडस्ट्री का समय नहीं, आपका समय तय करता है कॅरिअर

जब भी लोग मुझसे पूछते हैं कि उन्हें अपने बच्चों को किस अच्छी इंडस्ट्री पर ध्यान देने को कहना चाहिए, मुझे हमेशा यह कहानी याद आती है। उनका जन्म 13 अगस्त, 1936 को तमिल अयंगर ब्राह्मण माता-पिता के घर हुआ था। हालांकि, उनकी दादी यदुगिरी देवी का उनपर सबसे ज्यादा असर था। यह अलग बात है कि उनकी मां तमिल सिनेमा की मशहूर एक्ट्रेस थीं लेकिन सिनेमा कभी उनके बचपन के बीच नहीं आया। किसी भी ब्राह्मण लड़की की तरह, उन्हें वे सभी चीजें सीखनी पड़ीं, जो दक्षिण में हर बच्चे के लिए अनिवार्य होती हैं। दक्षिण या पूर्व में पैदा होने वाले ज्यादातर बच्चों को कोई कला सीखना जरूरी है। आज भी जब आप दक्षिण भारत और बंगाल में सूर्योदय के समय सैर पर जाएंगे, तो कहीं न कहीं से गायन के रियाज की या किसी के नृत्य अभ्यास से घुंघरुओं की आवाज जरूर आएगी।

चूंकि उन्होंने नृत्य के प्रति उत्साह दिखाया, इलसिए उन्हें यह सीखने दिया गया। उन्होंने इतनी तेजी से सीखा कि 1940 में 4 साल की उम्न में उन्होंने अपने डांस प्रोग्राम की पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दे दी। उसी उम्र में उन्होंने कई सार्वजनिक प्रस्तुतियां दीं। एक प्रस्तुति के दौरान उनका पैर करंट वाले तार पर पड़ गया और उन्हें अपने जीवन का सबसे तेज बिजली का झटका लगा। हालांकि लोग उन्हें जल्द होश में ले आए लेकिन उस बच्ची का पहला सवाल था, ‘क्या सब लोग तैयार हैं, मुझे प्रस्तुति देनी हैं।’ उस बच्ची को डांस के प्रति इतना जुनून था। ऐसी प्रतिबद्धता ने उन्हें पोप के सामने प्रस्तुति देने का भी मौका दिया। तब वे महज सात साल की थीं।

फिर 15 वर्ष की उम्र में उनपर एमवी रामन की नजर पड़ी, जो एक पारिवारिक दोस्त थे और एवीएम्स तमिल फिल्म प्रोडक्शन में काम करते थे। रामन ने उन्हें पहली तमिल फिल्म ‘वाझकई’ में लॉन्च किया। लेकिन रामन को बच्ची की दादी को यह समझाने में बहुत मुश्किल हुई कि वह फिल्मों के साथ भी अपनी पढ़ाई जारी रख पाएगी। रोचक बात यह है कि जब तक फिल्म बन नहीं गई, उन्होंने कभी अपनी सहेलियों को फिल्म साइन करने के बारे में नहीं बताया। फिल्म बड़ी हिट रही और इसका तेलुगु रिमेक भी बना। फिर 1951 में यह ‘बहार’ नाम से हिन्दी में भी बनी। और इस तरह वैजयंतीमाला का बतौर अभिनेत्री जन्म हुआ।

जब आप 1967 की फिल्म ‘ज्वेल थीफ’ का गाना ‘होठों में ऐसी बात मैं दबा के चली आई…’ सुनते हैं तो आपको दो ही लोग याद आते हैं। या तो गाने की गायिका मेलोडी क्वीन लता मंगेशकर या डांसिंग क्वीन वैजयंतीमाला, जो इस गाने में नजर आईं। उन्होंने ही हिन्दी सिनेमा में डांसर्स के लिए फुटवर्क का महत्व बताया और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उनके सभी गाने ‘आइटम नंबर’ की अवधारणा आने से बहुत पहले ही सिनेमाघरों में भीड़ खींच लाते थे।

वे ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होंने फिल्म अवार्ड्स नकार दिए और तब फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी, जब बीआर चोपड़ा जैसे लोगों को लगता था कि वे एक और दशक काम कर सकती हैं। ‘दीवार’ में अमिताभ की मां और ‘क्रांति’ में दिलीप कुमार की पत्नी जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने के ऑफर और पैसा भी उन्हें लुभा नहीं पाया। मैंने उनसे यह सीखा कि कभी यह न देखें कि कौन-सी इंडस्ट्री अच्छी चल रही है या नहीं। हमेशा सोचें कि आपने जो इंडस्ट्री चुनी है, उसे आप क्या दे सकते हैं।

फंडा यह है कि किसी इंडस्ट्री में बीता आपका अच्छा समय, उस इंडस्ट्री का अच्छा या बुरा समय देखने से कहीं ज्यादा जरूरी है।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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