ईश्वर के दिए ‘अनुमान’ के हुनर को न भूलें, यह स्वाभाविक हुनर है और कोई भी सही शिक्षा और सोच से इसे विकसित कर सकता है

आदि शंकराचार्य की ‘सौंदर्यलहरी’ का 100वां श्लोक समझाते हुए मेरी मां बताती थीं कि पुराणों में चंद्रमा और जल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पुराणों में कहा गया है कि चंद्रमा जल का स्रोत है। इसलिए पूर्णिमा के दिन जल ऊपर उठकर अपने स्रोत, चंद्रमा का अभिवादन करता है। मेरे दिमाग में यह छोटी-सी बात हमेशा बनी रही। इसलिए पूर्णिमा के दिन मैं मुंबई के समुद्र तटों पर नहीं जाता और बच्चों को भी यही सलाह देता हूं। बारिश के मौसम में इस दिन मैं आमतौर पर मुंबई में भी कहीं सफर नहीं करता क्योंकि यह तटीय शहर है। शुरुआत में मेरा परिवार मुझपर हंसता था लेकिन समय के साथ वे भी मेरे सिद्धांत को मानने लगे। याद है, हाल ही में दो पूर्णिमाओं पर, 6 जुलाई और 4 अगस्त को मुंबई बाढ़ की वजह से सुर्खियों में था। मैं मानता हूं कि हमारे इतिहास से ऐसी छोटी बात बेहतर हो जाती हैं, जब हम शिक्षा पाते हैं और हमने जो पढ़ा है तथा जो अनुभव किया है, उसके बीच तर्क तलाशते हैं।

यही कारण है कि मैं निजीतौर पर उनकी सराहना करता हूं जो अनुमान लगाते हैं और भविष्य की आपदा को रोकने के लिए कुछ करते हैं। ऐसी ही एक घटना 5 और 6 अगस्त की दरमियानी रात हुई। लोग घटना के टलने की बात कर रहे हैं, इसे टालने में मदद करने वाले तरीके की नहीं।

महेश नार्वेकर मुबंई नगरीय निकाय के साथ, आपदा प्रबंधन सेल के निदेशक के रूप में काम करते हैं और 2005 की भीषण बाढ़ के दौरान भी सेवा में थे। नार्वेकर 5 अगस्त की रात 11.30 बजे घर लौट रहे थे। उनकी कार व्यस्त पेडार रोड से गुजर रही थी, जहां लता मंगेशकर जैसी देश की कई नामी-गिरामी शख्सियतों से लेकर कई काउंसल जनरल तक रहते हैं। तभी उनके ड्राइवर ने सड़क पर एक उभार देखा और अपने बॉस को बताया।

नार्वेकर अपनी कार से उतरे और सामान्य जांच की। सड़क पर थोड़ी दरार थी और वहां से पानी निकल रहा था, जिसमें ताजी मिट्‌टी थी, गाद नहीं। उन्हें मिट्‌टी का स्रोत समझ आया और वे आस-पास के पेड़ देखने पहुंचे। पेड़ों की मिट्‌टी से पकड़ धीरे-धीरे छूट रही थी। नार्वेकर अनुमान लगा सकते थे कि कोई बड़ा संकट आ सकता है। इस मशहूर रोड पर ट्रैफिक हमेशा ज्यादा रहता है। उन्होंने असिस्टेंट म्युनिसिपल कमिश्नर प्रशांत गायकवाड़ को फोन कर कहा कि ट्रैफिक तुरंत बंद करना होगा। यह सड़क मालाबार हिल्स इलाके तक जाती है, जहां मुख्यमंत्री और राज्यपाल के घर हैं।

साथ ही यह मुबंई के दूसरे छोर को भी जोड़ती है। इसलिए ट्रैफिक रोकना और मौजूदा कारों को दूसरी दिशा में भेजना चुनौती बन गया। इसमें लगभग 90 मिनट लगे और रात एक बजे सड़क पर एक भी कार नहीं बची। और फिर बिल्कुल 30 मिनट बाद, रात 1.30 बजे बड़ा भूस्खलन हुआ, 50 पेड़ जड़ से उखड़ गए और 700 से ज्यादा बिल्डिंगों का पानी कनेक्शन कट गया। एक भी व्यक्ति घायल नहीं हुआ और एक भी कार को नुकसान नहीं पहुंचा। अगर वहां ट्रैफिक होता तो यह सबसे बुरा हादसा बन जाता। मलबा हटा दिया गया है लेकिन यह वीआईपी रोड शायद दो महीनों तक बंद रहे, जो बताता है कि बारिश ने कितना नुकसान पहुंचाया।

फंडा यह है कि ज्यादातर लोग ईश्वर द्वारा दिए गए अनुमान के हुनर को भूल गए हैं और उसे शिक्षा के जरिए बेहतर भी नहीं बना रहे हैं। यह स्वाभाविक हुनर है और कोई भी सही शिक्षा और सोच से इसे विकसित कर सकता है।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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