ईश्वर भी उनकी मदद करता है, जो खुद की मदद करते हैं, कम से कम मौजूदा धन के प्रबंधन और सुरक्षा के मामले में तो ऐसा ही है

Management Funda by N. Raghuraman

सदियों से धनतेरस मनाने के महत्व को लेकर कई कहानियां रही हैं। और उनमें से एक है कि कैसे लक्ष्मी सोने के भरे कलश और धन के देवता कुबेर के साथ क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं। ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मी अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने के लिए कुबेर देवता को लाई थीं। हालांकि मैं भी बहुत धार्मिक व्यक्ति हूं और मानता हूं कि ईश्वर भक्तों की कामनाएं पूरी करते हैं, लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि यह भक्त की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने धन का प्रबंधन करे। और ये दो घटनाएं मेरे विश्वास को मजबूत करती हैं।

इस बुधवार मैं अपने परिवार के साथ ज्वेलर की दुकान पर था। मैंने वहां धनतेरस के लिए खरीदारी कर रही एक अधेड़ महिला की बातें सुनीं, जिन्होंने काउंटर के उस पार खड़े व्यक्ति को 9,500 रुपए दिए थे और कह रही थीं कि उन्होंने 10 हजार रुपए दिए हैं। सेल्समैन ने कई बार पैसे गिनकर उन्हें बताया कि 500 रुपए कम हैं। एक नजर में मुझे लगा कि महिला ईमानदार लग रही हैं और 500 रुपए की लिए झूठ नहीं बोलेंगी।

मैंने उनसे कहा कि वे डस्टबिन से वह लिफाफा निकालकर जांच लें, जिसे उन्होंने पैसे देने के बाद फेंक दिया था। ऐसा करने पर उन्हें लिफाफे के अंदर चिपका 500 को नोट मिल गया। यह देख सभी सेल्समेन ने राहत की सांस ली क्योंकि वहां कुछ ही मिनटों में उनपर अविश्वास का ऐसा माहौल बन रहा था, जो उनकी प्रतिष्ठा के लिए अच्छा नहीं था। वे महिला मुझे धन्यवाद देते हुए दुकान से चली गईं। एक और रोचक घटना बीते रविवार को हुई थी।

पुणे के पिंपरी-चिंचावड़ इलाके की रहवासी रेखा सेलुकर दीपावली के अवसर पर होने वाली सालाना सफाई में लगी थीं। उन्हें एक पुराना घिसा हुआ बैग मिला, जिसे उन्होंने वर्षों से इस्तेमाल नहीं किया था। स्वाभाविक है कि उन्होंने उसे अलमारी से निकालकर फेंकने का फैसला लिया। फिर उस इलाके की कचरा गाड़ी आई, जिसे उसमें बजने वाली घंटियों के कारण ‘घंटा गाड़ी’ कहते हैं। रेखा ने उस पुराने बैग समेत सारा कचरा गाड़ी में डाल दिया। लगभग दो घंटे बाद अचानक उन्हें याद आया कि उस बैग में एक मंगल सूत्र, एक जोड़ी पायल, चांदी के एक पाउच समेत अन्य ज्वेलरी रखी थीं, जिनकी कीमत तीन लाख रुपए थी!

रेखा ने तुरंत स्थानीय समाजसेवी संजय कुटे से मदद मांगी, जिन्होंने पिंपरी-चिंचावड़ म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (पीसीएमसी) के स्वास्थ्य विभाग की टीम से संपर्क किया और उन्हें इस गड़बड़ी की जानकारी दी। यहां रेखा का परिवार कचरे के डिपो के लिए निकला, उधर पीसीएमसी स्टाफ ने पहले पता किया कि क्या कचरा गाड़ी अब भी इलाके में है। लेकिन वह पहले ही कचराघर में कचरा फेंक आई थी, जहां से उसे कॉम्पैक्टर ने उठा लिया था। याद रहे, उस दिन रविवार था, इसीलिए हफ्ते के बाकी दिनों की तुलना में कर्मचारियों की संख्या कम थी।

सैनिटरी इंस्पेक्टर सुशील मालायी ने कचरे के डिपो पर स्टाफ को अलर्ट कर दिया था। उन्होंने उस कॉम्पैक्टर की पहचान कर ली, जिसने उस कचराघर से कचरा उठाया, जहां गाड़ी ने कचरा खाली किया था। डिपो में डेटा एनालिटिक्स का काम करने वाले 33 वर्षीय हेमंत लखन मदद के लिए आगे आए। हेमंत ने ज्वेलरी वाला बैग ढूंढने के लिए 18 टन कचरे की छानबीन की। क्योंकि वहां परिवार भी मौजूद था, इसलिए कई नजरों की मदद से उस पुराने बैग को खोज लिया गया, जिसमें काफी गंदगी जमा हो चुकी थी। दोनों ही घटनाओं में खरीदारी या साफ-सफाई के जोश में कुछ लापरवाही बढ़ गई थी।

फंडा यह है कि ईश्वर भी उनकी मदद करता है, जो खुद की मदद करते हैं। कम से कम मौजूदा धन के प्रबंधन और सुरक्षा के मामले में तो ऐसा ही है।-एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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