उद्यमशील समाज का हिस्सा बनें, छोटे-छोटे ‘गिग’ बिजनेस शुरू करते रहें, पता नहीं कब, कौन-सा मुश्किल वक्त में काम आ जाए

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

ठीक एक साल पहले 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान हम सभी घरों में रहे थे और उस दिन हमने अपने परिवार के सदस्यों के साथ का आनंद लिया था। लेकिन ज्यादातर लोगों को अंदाजा नहीं था कि यह तो बुरे दिनों की शुरुआत भर थी। जैसे-जैसे दिन बीते और लॉकडाउन ढाई महीनों तक जारी रहा, हमें धीरे-धीरे बुरी कहानियां सुनने मिलने लगीं। कई लोगों की नौकरी और उनकी आय का एकमात्र स्रोत खत्म हो गया।

करण शर्मा और उसकी पत्नी अमृता जैसे लोगों का घर तक चला गया। पिछले चार दिन से उनके बारे में एक वीडियो वायरल हो रहा है। उसमें बताया गया है कि करण एक मंत्री का ड्राइवर था और नई दिल्ली में सरकारी स्टाफ क्वार्टर में रहता था। लॉकडाउन के बाद उसकी नौकरी चली गई और घर खाली करने के लिए पुलिस का दबाव बनाया गया। दो महीने दोनों अपनी कार में रहे। बंगला साहिब गुरुद्वारा में रोजाना लंगर खाने से लेकर मेट्रो स्टेशनों के सार्वजनिक शौचालय इस्तेमाल करने तक, दंपति ने एकसाथ रहते हुए अपने जीवन का सबसे बुरा वक्त देखा।

फिर उन्होंने अपनी कार को रेस्त्रां में बदलने का फैसला लिया। अमृता और करण सुबह तीन बजे उठकर स्वादिष्ट राजमा-चावल पकाने लगे और तालकटोरा स्टेडियम के पास कम कीमत पर उन्हें बेचकर रोजी-रोटी चलाने लगे। शुरुआत 350 रुपए से हुई थी और आज वे 2000 रुपए प्रतिदिन कमा रहे हैं। कुछ दिनों पहले हमें दिल्ली की ही रजनी सरदाना के बारे में पता चला था, जिसके पति की नौकरी लॉकडाउन में चली गई।

जब घर चलाना और बेटी का पालन-पोषण मुश्किल हो गया तो रजनी को सड़क किनारे बिरयानी बेचने का आइडिया आया क्योंकि उनके पास किराए से दुकान लेने के पैसे नहीं थे। आज वह अपने पति के साथ दिल्ली के रोहिणी कोर्ट के पास बिरयानी बेचकर आजीविका कमा रही है। लोगों को उसकी बिरयानी पसंद है और वे उसे ‘आयरन लेडी’ और ‘बिरयानी वाली आंटी’ कहते हैं। पति की नौकरी जाने से लेकर सफलतापूर्वक स्टॉल चलाने तक, रजनी ने लंबा सफर तय किया है।

सिर्फ कर्मचारी ही पीड़ित नहीं थे। लॉकडाउन ने कई लोगों को बिजनेस बंद करने पर मजबूर किया। दिल्ली के दीपक को छोले-भटूरे की दुकान बंद करनी पड़ी थी क्योंकि वह किराया, अन्य खर्च और कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकता था। घर चलाने के लिए उसके लिए दिल्ली जल बोर्ड गोदाम के पास बाइक पर छोले-कुलचे बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

अगर आपको लगता है कि छोटी कंपनियों के कर्मचारी ही प्रभावित हुए और बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नहीं, तो आप गलत हैं। नोएडा के रवि का उदाहरण देखें, जो टूर और ट्रैवल सेक्टर की बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे। नौकरी जाने के बाद रवि ने उम्मीद नहीं छोड़ी और जरूरतें पूरी करने के लिए सेक्टर 19, नोएडा में खाने का स्टॉल शुरू कर दिया। आज उसके स्टॉल में पेटीस, सेंडविच, बर्गर और मॉकटेल मिलते हैं, जिन्हें कई लोग काफी पसंद कर रहे हैं।

यह बहुत बुरा साल था। लोगों की नौकरी-घर चले गए, वेतन कटौती हुई, घर चलाना मुश्किल हो गया, बचत खत्म हो गई। इस दौरान नए प्रयोगों की एक किरण चमकी। निम्न मध्यमवर्ग ने खुद पर और अपने कौशलों पर काम किया और विभिन्न ‘गिग’ (छोटे-छोटे कौशल और बिजनेस) शुरू किए। ऐसे कौशल खोजे जो पैसा कमाने और व्यापार स्थापित करने में उनकी मदद कर सकें।

फंडा यह है कि उद्यमशील समाज का हिस्सा बनें, छोटे-छोटे ‘गिग’ बिजनेस शुरू करते रहें। पता नहीं कब, कौन-सा गिग मुश्किल वक्त में आपके काम आ जाए।

Leave a Reply