ऑउट ऑफ बॉक्स’ वाली सोच जिंदगी का हिस्सा है!

आपको हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर कोई कहे कि वैज्ञानिक रिसर्च के लिए साइंस की डिग्री की जरूरत नहीं है या फिर आप पशु या ट्रैक्टर की बजाय एक साइकिल से खेत जोत सकते हैं या फिर फ्लैक्स के थैलों को किराए पर देने का अनदेखा-अनसुना बिजनेस कर सकते हैं। इस बात की पुष्टि के लिए कुछ सबूत भी हैं।
पहली कहानी: एक आईटी प्रोफशनल से रिसर्चर बनने वाले आर चैतन्य अपने आप में एक केस स्टडी की तरह हैं। शुरुआत में उन्होंने जीवों की प्रजातियों के बारे में जानना और उन्हें ढूंढना शुरू किया। वे देश के पश्चिमी घाट की वादियों में अब तक 15 नई प्रजातियां ढूंढ चुके हैं। अमात्य शर्मा जब चौथी कक्षा में पढ़ते थे तभी से उन्हें बर्ड वॉचिंग का शौक था। अब वे जंगल के जीवन को समझने और उसे दस्तावेज में रूप दर्ज करने में जुटे हैं। उन्हें उम्मीद है कि ये कोशिश उन्हें रिसर्च के क्षेत्र में आगे ले जाएगी। ये दोनों ही व्यक्ति एक ऐसे समूह का हिस्सा हैं, जहां एक वास्तविक सरीसृप वैज्ञानिक (हर्पेटोलॉजिस्ट), ऐसे वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफरों को वैज्ञानिक शोधकर्ताओं में बदल रहा है। ये लोग ऐसी रुचियों को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे नया सीखा जा सके। गिरि कहते हैं कि “इस मुहिम के लिए टैक्सोनॉमी, हर्पेटोलॉजी के विशेषज्ञों के अलावा प्रकृतिवादी भी एक साथ आ रहे हैं। अलग-अलग क्षेत्रों के इन विशेषज्ञों द्वारा नई प्रजातियों की खोज करना, उनकी जंगल और जीवों संबंधी शोध की दिशा में बड़ा योगदान है।
दूसरी कहानी: उत्तरी कर्नाटक के किसान एक के बाद एक नई मुसीबतें झेल रहे हैं। सूखे से बचने के लिए कुछ समय पूर्व उन्होंने अपने मवेशी बेच दिए थे। कुछ ही समय बाद भीषण बाढ़ भी आ गई जिसमें उनके इलाके में 1400 से ज्यादा पशुओं की जान चली गई। इसी जिले के कुसुगल गांव के हनुमनथप्पा बोलसुर भी ऐसे ही पीड़ित किसानों में से एक हैं। विषम परिस्थितियों ने उसे कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया। उसने बागलकोट जिले में एक किसान के यहां ऐसा उपकरण देखा था जिसमें हल में साइकिल का पहिया लगाकर जुताई की जाती थी। 58 साल के इस किसान की जेब में इतना पैसा नहीं था कि वह 600 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से ट्रैक्टर किराए पर लेकर खेती करे। उसने दिमाग लगाया और सिर्फ 2000 रुपए खर्च करके एक ऐसा ही उपकरण तैयार कर लिया। उसने साइकिल के एक पहिये में लकड़ी के दो नुकीले टुकड़ों को फिट कर दिया जो पीछे एक रस्सी से जुड़े होते हैं और किसान यह रस्सी हाथ में पकड़कर इस उपकरण को मनचाही दिशा में घुमा सकता है। लकड़ी के टुकड़े एक तरह से हल का काम काम करते हैं। किसान का 20-वर्षीय लड़का महन्तेश इस उपकरण के इस्तेमाल में पिता की मदद करता है और उन्हें एक एकड़ जुताई करने में कुल तीन घंटे का समय लगता है। अब, दूसरे गांव वाले भी मुफ्त में उनके जुगाड़ को मांगकर ले जा रहे हैं।
तीसरी कहानी: बेंगलुरु के सुमधुरा सिल्वर रिपल्स अपार्टमेंट के निवासियों ने कभी नहीं सोचा था कि फ्लेक्स बैनर से झोले बनाने की उनकी कोशिश रंग लाएगी और ऐसे 5000 झोले बनाकर उन्हें किराए पर देने का आइडिया मिल जाएगा! अब वे यहां की हर एक सोसायटी के गेट पर ऐसे 100 झोले रख देते हैं और सिर्फ 30 रुपए प्रति झोला के सिक्योरिटी डिपॉजिट लेकर उन्हें किराए पर चलाते हैं। अगर कोई ग्राहक झोले को लौटाता नहीं है या खराब कर देता है तो उसका डिपॉजिट लौटाया नहीं जाता है।
फंडा यह है कि  ‘ऑउट ऑफ द बॉक्स’ सिर्फ मैनेजमेंट की पढ़ाई का शब्द नहीं है। यह तो ऐसा एक्सपेरिमेंट है जिसका कभी ‘एक्सपीरियंस’ नहीं लिया गया या उसे रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल नहीं किया गया।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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