कई बार आपको जगह के मुताबिक एक तय स्टैंडर्ड के कपड़े पहनना जरूरी होता है, ताकि बाकी समाज आपको स्वीकार करे

रवि पाटिल साइकिल लाइब्रेरियन हैं। वे दान में किताबें लेकर उन लोगों को मुफ्त में देते हैं जो पढ़ना चाहते हैं। लोग उनकी वेबसाइट/एप पर किताबें ऑर्डर करते हैं और रवि पूरे अहमदाबाद में कहीं भी साइकिल से किताब डिलिवर कर देते हैं। ज्यादातर वे टीशर्ट और बरमुडा पहनते हैं। हाल ही में वे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की जमालपुर-एस्टोडिया ब्रांच में कुछ कैश जमा करने गए। गार्ड ने उन्हें रोक दिया क्योंकि वे ‘उचित कपड़े’ नहीं पहने थे। गार्ड और रवि की बहस सुन मैनेजर बाहर आए और उन्होंने कहा, ‘आप शॉर्ट्स पहनकर अंदर नहीं जा सकते।’

जब मैनेजर उसके तर्क से संतुष्ट नहीं हुए तो रवि, जो थियेटर आर्टिस्ट भी हैं, ने बैंक में अपना खाता बंद करने का फैसला लिया। उसे मनाने की बजाय मैनेजर ने रवि को क्लोजर फॉर्म दे दिए। रवि ने बाहर ही खड़े होकर फॉर्म भरे और सिक्योरिटी गार्ड ने अंदर जाकर उन्हें जमा कर दिया। फिर वे साइकिल से घर गए और खाता बंद करने के लिए जरूरी चेकबुक और अन्य दस्तावेज लाकर जमा किए।

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दो हफ्ते पहले ही मैं मुंबई में पवई लेक पर शाम की सैर के लिए निकला था। तभी मेरी पत्नी ने फोन पर कुछ पैसे निकालते हुए आने को कहा। सैर खत्म करने के बाद मैं पैसे निकालने के लिए एटीएम गया, तभी मुझे बैंक मैनेजर का फोन आया, जिन्होंने मुझे सीसीटीवी में देख लिया था। उन्होंने मुझे अंदर आमंत्रित किया। चूंकि मैं शॉर्ट्स पहने था, इसलिए मैंने यह कारण बताते हुए बाद में आने का वादा किया। मुझे लगा कि पूरी बांह वाली शर्ट और टाई पहने मैनेजर से, उनके ही केबिन में शॉर्ट पैंट पहनकर मिलना ठीक नहीं होगा। मेरी चिंता यह थी कि उनके सहकर्मी यह न सोचें कि ‘मैनेजर का कैसा दोस्त है।’ लेकिन वे बोले, ‘मुंबई में कपड़े की परवाह कौन करता है।’ मैं इसपर हंसकर बोला, ‘मैं’ और फिर कभी आने का वादा कर चला गया।

उस रात डिनर टेबल पर जब मैंने इस घटना की चर्चा की तो मेरी बेटी, जो लगभग रवि की उम्र की ही होगी, बोली, ‘आकर्षक दिखने से क्या फर्क पड़ता है, जब आप परवाह ही नहीं करते कि लोग क्या सोचेंगे?’ तो मैंने पलटकर पूछा, ‘भले ही तुम्हें इसकी परवाह न हो कि दूसरे क्या सोचते हैं लेकिन फिर भी तुम्हें जिंदगी में बेहतर करने की इच्छा नहीं होती?’ उसने जवाब नहीं दिया तो मैंने बोलना जारी रखा, ‘आसान शब्दों में कहूं तो आपको कई बार जगह के मुताबिक एक तय स्टैंडर्ड के कपड़े पहनना जरूरी होता है, ताकि बाकी समाज आपको स्वीकार करे।

इसका मतलब यह नहीं कि आपको कोई खास स्टैंडर्ड अपनाना होगा, लेकिन यह ऐसा होना चाहिए जो ज्यादातर लोगों को स्वीकार हो, जहां साझा सोच के साथ बातचीत शुरू हो सके और मन इस बात में न उलझे कि व्यक्ति बाहर से कैसा दिख रहा है।’ फिर किसी भी युवा की तरह बेटी ने पूछा, ‘आप दूसरों को अपने लुक्स से खुश करना क्यों चाहते हैं?’ मैंने कहा, ‘क्योंकि हम सामाजिक प्राणी हैं, हमें अन्य इंसानों से संवाद करना होता है और यह आकर्षक दिखने से ही शुरू होता है।’

अगर आप नियम के अनुसार देखें तो रवि और उनके समर्थक बिल्कुल सही हैं और बैंक किसी को बरमुडा पहनकर आने से नहीं रोक सकता। मैं इसका समर्थन करता हूं। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि आप खुद को कैसे प्रस्तुत करते हैं, इसकी कई जरूरी कामों को पूरा करने में बड़ी भूमिका होती है और इससे आप सामने वाले की नजरों में ऊपर उठते हैं। इसलिए इस कारक को नकार नहीं सकते।

फंडा यह है कि सम्मान हमेशा मिलता नहीं है, कई बार इसे लेना भी पड़ता है और खुद को पेश करने का तरीका (प्रेजेंटेबिलिटी) इसका एक रास्ता है।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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