कम्प्यूटरों में बाहरी घुसपैठ रोकने के लिए फायरवॉल की जरूरत होती है, लेकिन नैतिक लोग ज्यादा जरूरी हैं ताकि फायरवॉल में छेद न किए जाएं

मे रे एमबीए के दिनों में मेरे एक प्रोफेसर ने कहा था, ‘चीन की महान दीवार 100 ईसा पूर्व में बनी थी और अगले 100 वर्षों में वह तीनों बड़े युद्ध हार गया। ऐसा इसलिए क्योंकि आपकी सुरक्षा, दीवार से नहीं होती, बल्कि दीवार की सुरक्षा करने वालों से होती है। इसलिए सही लोगों को चुनें।’ मुझे ये सलाह तब याद आई जब मुझे इस बुधवार ये चौंकाने वाली कहानियां पता चलीं।

पहली कहानी: छोटे और मझोले किसानों को 6000 रुपए सालाना की वित्तीय मदद देने के लिए दिसंबर 2018 में शुरू हुई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में बहुत बड़ी धोखाधड़ी तेजी से बढ़ रही है। हाल ही में हुई तमिलनाडु कृषि विभाग की जांच में सामने आया कि लाभार्थियों में 5.5 लाख से ज्यादा नकली नाम हैं, जिससे ठगों ने राजकोष को करीब 110 करोड़ रुपए का चूना लगाया। यह अपराध हुआ कैसे?

एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी में अनुबंधित कर्मचारियों ने कृषि विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलकर सिंडिकेट बना लिया। उन्होंने खंड स्तर के अधिकारियों के लॉगइन और पासवर्ड इस्तेमाल किए और रिश्वत लेकर नकली दस्तावेजों से अयोग्य लोगों को स्कीम के तहत जोड़ लिया। स्कीम से जुड़ने के लिए किसान के पास दो हेक्टेयर तक जमीन होनी चाहिए।

क्या आप सोच रहे हैं कि 6000 रुपए सालाना की छोटी राशि के लाभ के लिए कितनी रिश्वत हो सकती है? उन्होंने एक ही परिवार से कम से कम चार लोगों को शामिल किया और गैर-किसानों तक को लाभार्थी बनाकर अपना हिस्सा ले लिया। चूंकि महामारी के कारण लाभार्थियों की जमीन का भौतिक सत्यापन नहीं हो रहा है, इसलिए यही कार्यप्रणाली राज्य के कई जिलों में अपनाई गई।

विभाग अब तक 32 करोड़ रुपए वसूल पाया है। केंद्र की योजना के दुरुपयोग का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि उन लोगों को भी योजना का लाभ मिल गया जो ग्रेटर चेन्नई के कंक्रीट के जंगलों वाले इलाकों में रहते हैं।

दूसरी कहानी: पुणे जिले के 23 आदिवासी आश्रम स्कूलों के करीब 5000 छात्रों को पिछले कुछ दिनों में फ्लेवर्ड दूध के 25-25 टेट्रा पैक मिले, जिनकी एक्सपायरी डेट सितंबर 9 और 10 है। जनजातीय विकास विभाग को छात्रों में पोषण बनाए रखने की नीति के तहत लॉकडाउन के दौरान ये टेट्रा पैक बांटने थे। लेकिन वे उन तक पहुंचे ही नहीं। इन 23 आदिवासी आश्रमों को नियंत्रित करने वाले इंटीग्रेटेड ट्रायबल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट ऑफिस ने इस सोमवार और मंगलवार को दो लाख लीटर दूध के पैकेट बांटे। पैकेजिंग की तारीख 10 मार्च थी। छात्रों को पेटदर्द की शिकायत के बाद जांच शुरू की गई।

तीसरी कहानी: महाराष्ट्र में मालेगांव के पूर्व संरपंच पर आरोप है कि उसने लोगों की अनभिज्ञता का लाभ उठाते हुए टीकाकरण कैंप आयोजित किया और दावा किया कि वहां कोरोना का टीका लगाया जा रहा है। बाद में पता चला कि वहां टीबी से लड़ने वाला बीसीजी टीका लगाया गया।

जो भी हो, वह कैंप गैरकानूनी था क्योंकि उसे सरकार ने अनुमति नहीं दी थी। अब 53 हजार लोगों में से एक की शिकायत पर स्वास्थ्य विभाग जांच कर रहा है और पुलिस भी जांच करेगी। याद रखें, कि तीनों मामलों में पीड़ित गरीब किसान, बच्चे और अशिक्षित ग्रामीण हैं। जबकि कथित आरोपी शक्तिशाली लोग हैं।

फंडा यह है कि कम्प्यूटरों में बाहरी घुसपैठ रोकने के लिए फायरवॉल (सुरक्षा दीवार) की जरूरत होती है, लेकिन नैतिक लोग ज्यादा जरूरी हैं ताकि फायरवॉल में छेद न किए जाएं।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

Leave a Reply