कलियुग की तीसरी आंख है टेक्नोलॉजी, इसकी लीलाएं भी कृष्ण जैसी !

जन्माष्टमी के दौरान, आपमें से बहुत लोगों ने भगवान कृष्ण की विभिन्न लीलाओं के दृश्य देखे होंगे और आपके चेहरे पर एक मुस्कान आई होगी। लेकिन कभी-कभी कुछ लोग ऐसी गड़बड़ ‘लीला’ कर जाते हैं जिन्हें देख वाकई हंसी छूट पड़ती और इन्हीं गड़बड़ियों के कारण उन्हें एक तीसरी आंख-टेक्नोलॉजी के हाथों सजा भी मिलने लगी है। कुछ ऐसे ही मजेदार उदाहरण।
पहली कहानी: सोमवार को औरंगाबाद के हेड कांस्टेबल सुभाष काले ने मुम्बई के नंबर वाली एक कार को बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच के बाहर ‘नो पार्किंग’ जोन में खड़ा देखा। उसने ड्राईवर को बाहर आने और जुर्माना भरने के लिए कहने से पहले कार का फोटो खींचा। सिर्फ 200 रुपए जुर्माना चुकाना था। काले ने अपनी हैंडहेल्ड डिवाइस से ई-चालान प्रिंट करने के लिए कार का रजिस्ट्रेशन नंबर डाला, लेकिन अचानक ही सेंट्रलाइज्ड ई-चालान सिस्टम से जुड़ी इस मशीन में से एक लम्बी सी लिस्ट निकली जिसमें इस गाड़ी चालक द्वारा किए गए पिछले सभी ट्रैफिक नियम तोड़ने के मामले दर्ज थे। काले को मशीन में गड़बड़ी का शक हुआ, तो उसने एक बार फिर से नंबर डाला। लेकिन इस बार भी मशीन से 13 अलग-अलग नियम तोड़ने की वही लिस्ट निकली। ये नियम मुम्बई में तोड़े गए थे और 12,400 रुपए बकाया जुर्माने के साथ कार मालिक के नाम पर दर्ज थे। कांस्टेबल काले ने तय किया कि ई-चालान सिस्टम की मदद से वह पूरा जुर्माना वसूल करेगा। थोड़ी ना-नुकुर के बाद उस कार मालिक को कुल 12,600 रुपए का जुर्माना भरना ही पड़ा और इसमें 200 रुपए औरंगाबाद के थे।
दूसरी कहानी: पटना के बभौल गांव के सुरेश राम, बिहार प्रशासन में असिस्टेंट इंजीनियर हैं, लेकिन पता चला है कि ये महाशय एक साथ तीन अलग-अलग पदों के लिए तनख्वाह ले रहे थे। यह धोखाधड़ी कुछ एक महीनों से नहीं, पिछले 30 साल से चल रही थी! उसने हर एक पद के लिए समय-समय पर प्रमोशन भी हासिल किया था! 20 फरवरी 1988 को सुरेश पहली बार राज्य लोकनिर्माण विभाग में जूनियर इंजीनियर नियुक्त हुआ था। अगले साल उसे जल संसाधन विभाग में नौकरी मिली जहां उसने 28 जुलाई 1989 को चार्ज भी ले लिया। इसी जल संसाधन विभाग में, उसी साल एक और नौकरी दी गई और सुपौल जिले में पोस्टिंग दी गई। लेकिन, इस हफ्ते सुरेश की धोखाधड़ी राज्य सरकार के कर्मचारियों को तनख्वाह के लिए लागू किए नए फाइनेंनशियल टूल – काम्प्रिहेंसिव फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम में पकड़ में आ गई। इसमें आधार, जन्म तारीख और पैन नंबर जैसी जानकारियां भरनी पड़ती हैं। सुरेश के मामले में उसी के एक साथी की ही शिकायत के बाद इस सिस्टम ने पूरा कच्चा चिट्ठा खोल दिया। सीएफएमएस टूल ने पहचान न की होती तो, कुछ वर्षों बाद सुरेश तीनों पदों से -एक के बाद एक- रिटायर हो जाता। तब उसे पकड़ पाना मुश्किल था।
तीसरी कहानी: अगर आपको लगता है कि सिर्फ कोई व्यक्ति ही ऐसी गड़बड़ ‘लीला’ कर सकता है तो अब यह सच जानकर आपका टेक्नोलॉजी पर भरोसा और बढ़ जाएगा। इस हफ्ते जनगणना-पूर्व की एक गणना में केंद्रीय गृह मंत्रालय और तेलंगाना व आंध्र प्रदेश के जनगणना निदेशालय ने ऐसे 460 गांवों और दो नगरों की पहचान की है जो तेलंगाना से गुम हो गए हैं। ये 460 गांव प्रदेश के 14 नव-निर्मित जिलों का हिस्सा थे, जिनका निर्माण तेलंगाना राज्य सरकार ने जिलों के पुनर्गठन के समय किया था। दिलचस्प रूप से, इन जिलों को 58 मंडलों में भी बांटा गया था और इनके नाम पर सरकार की विभिन्न योजनाओं का फायदा भी उठाया जा रहा था। जांच अधिकारी उस समय और ज्यादा चौंके जब उन्हें पता चला कि इन गांवों में से 36 गांव ऐसे थे जो 2011 की जनणगना में भी अस्तित्व में नहीं थे।
फंडा यह है कि  टेक्नोलॉजी इस कलियुग में टैक्स चुकाने वाले लोगों के लिए किसी ‘वरदान’ से कम नहीं, खासतौर पर उस दौर में जहां कई तरह की गड़बड़ ‘लीलाएं’ चोरी-छुपे किसी न किसी कोने में दिखाई जा रही हंै!
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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