कार्यस्थल के रिश्तों में पारदर्शिता क्यों जरूरी?

रिश्ते अक्सर पेचीदा होते हैं। कुछ रिश्ते आपको हैरान करते हैं तो कुछ सुखद यादें दे जाते हैं जैसा कि एक अनुभव मुझे इंडोनेशिया में हुआ था। सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले इस देश का बैंक ऑफ इंडोनेशिया अपने करंसी नोट पर भगवान गणेश का चित्र प्रिंट करता है! यह चित्र सारे नोटों पर तो नहीं होता लेकिन 20 हजार रुपए के नोट पर प्रमुखता से देखा जा सकता है, जिसे मैंने अपनी यात्रा के दौरान स्वयं देखा। इसके उलट कुछ रिश्ते थोड़ी अजीब होते हैं जैसे कि गुजरात फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी और इसके छात्रों के बीच हैं। ‘एजुकेशन थ्रू इन्वेस्टिगेशन’ के मिशन स्टेटमेंट वाली इस यूनिवर्सिटी ने पिछले हफ्ते खुद को एक बड़ी ही विकट स्थिति में पाया जब उसे अपने ही कुछ छात्रों के प्रति अपनी ही ‘दुर्भावना’ की जांच करने को कहा गया। हाल ही में घोषित किए परिणामों में यूनिवर्सिटी से एमफिल कर रहे कुछ छात्र अपनी थ्योरी और प्रैक्टिकल परीक्षा में मात्र 2-3 नंबरों से फेल हो गए और इसके बाद उन्होंने अपनी ही यूनिवर्सिटी पर आरोप लगाया कि वहां गुजराती लोगों के प्रति ‘दुर्भावना’ रखी जाती है! हालांकि, यूनिवर्सिटी ने मंगलवार से अपनी पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया शुरू कर दी है।
जैसा कि मैंने पहले कहा अपने कार्यस्थल पर रिश्ते बड़े पेचीदा होते हैं, खासतौर पर एक बॉस के अपने कर्मचारियों या वेंडरों के साथ या फिर सरकारी दफ्तरों में शिकायतकर्ताओं के साथ, इनमें हमेशा एक क्राइम स्टोरी नज़र आती है। रिश्तों की यह कहानी भी ऐसी ही है-
मामला पुणे का है। 16 जुलाई 2019 को सफर पर निकले एक कंस्ट्रक्शन कम्पनी के 39 वर्षीय मालिक ने देखा कि सामने की दिशा से मोटरसाइकिल पर बैठे दो युवक आ रहे हैं और एक ने उसकी ओर गन तान रखी है। मौत के डर से उसने अपना मोबाइल फोन उनकी ओर उछाल दिया और हमले से बच गया। वह तुरंत नज़दीक के पुलिस स्टेशन में गया और अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया। इस घटना के कुछ ही समय बाद उसे पता चला कि ये साजिश उसकी अपनी पत्नी और उसके दोस्त निमेश पवार ने मिलकर रची थी। जब वह पवार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने पहुंचा तो पुलिस ने उससे 10 लाख रुपए की मांग की। पुलिस ने यह भी कहा कि पवार इस समय देश से बाहर है और लौटेगा तो उसे समन भेजेंगे। मामले में धारा 307 (जान से मारने की कोशिश) के तहत केस दर्ज करने बजाय उन्होंने आईपीसी की धारा 506 (2) लगाई और प्रकरण को कमजोर करने की कोशिश की। 7 अगस्त को वह फिर उसी पुलिस स्टेशन पहुंचा तो यह देखकर चौंक गया कि मामले की जांच कर रहा सब इंस्पेक्टर तुकाराम एफ फड़ और पुलिस कांस्टेबल आरोपी पवार के साथ बैठकर खाना खा रहे हैं। उसने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और उनका फोटो खींचकर पुणे सिटी कमिश्नर डॉ. के वेंकटेशम के पास शिकायत दर्ज कराई, जिन्होंने शिकायत पर तुरंत संज्ञान लेते हुए मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी। जांच में सामने आया कि आरोपी के साथ पुलिस की मिलीभगत का आरोप सही है और उस पुलिस अधिकारी और उसके दो सहयोगियों- प्रवीण खड़ालकर और अविनाश सावंत ने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया है और शिकायत पर कार्रवाई करने की बजाय पैसों का लेन-देन हुआ था। इन तीनों को निलंबित करते हुए वेंकटेशम ने कहा, ‘एक शिकायत करने वाला अगर पुलिस और आरोपियों के साथ खाना खाने का फोटो सबूत के तौर पर लेकर आए तो यह हमारे लिए वाकई अपमानजनक है’। इस रोचक मामले का पटाक्षेप होता है सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर और उस पुलिस स्टेशन के प्रभारी भास्कर जाधव के तबादले के साथ जिसे कंट्रोल रूम में एक कमतर पद पर भेज दिया जाता है। ध्यान दीजिएगा कि खींचे गए फोटो में जाधव मौजूद नहीं था।
फंडा यह है कि  अगर आप किसी विभाग के प्रमुख हैं और ‘दूरियों-नजदीकियों’ को लेकर रिश्तों में पारदर्शिता नहीं रखते हैं, तो अंत में नतीजे आप को ही भुगतना पड़ेंगे।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

Leave a Reply