किताबें पढ़ने के लिए होती हैं, फाड़ने के लिए नहीं !

अरब के दार्शनिक अल जहीज ने एक बार कहा था, ‘एक किताब तब तक मौन रहती है, जब तक आप उसे मौन रखना चाहते हैं और जब आप कुछ सुनना चाहते हैं तो वह बोल उठती है। अगर आप कहीं व्यस्त हैं तो वह आपको कभी परेशान नहीं करती, लेकिन अगर आप कभी अकेला महसूस करते हैं तो वह आपके लिए एक अच्छा साथी बन जाती है। यही ऐसा दोस्त है जो कभी भी आपको धोखा नहीं देता या कपट नहीं करता है, और यह ऐसा साथी है जो आपसे ऊबता नहीं है।’पिछले दिनों मुझे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के कसर अल वतन पैलेस म्यूजियम में एक किताब के बारे में लिखे ये बेहतरीन शब्द पढ़ने को मिले। जब मैंने पुणे की एक अजीब सी घटना के बारे में सुना तो मुझे यही सुभाषित ध्यान आया।
अब जरा कल्पना कीजिए कि आप किचन में स्कूल के लिए लन्च तैयार कर रही हैं और घर के ड्राइंग रूम में बैठा आपका कक्षा चौथी में पढ़ने वाला बेटा या बेटी चिल्लाकर यह बताए कि ‘मम्मी मैंने, हिस्ट्री और ज्यॉग्रफी का तीसरा चैप्टर, फिजिक्स और केमेस्ट्री का दूसरा चेप्टर और सिविक्स की किताब से पहला चैप्टर फाड़कर रख लिया है, लेकिन आपको क्या लगता है, उसने वाकई ऐसा किया? सचमुच बच्चे ने स्कूल की किताबों को फाड़ दिया है और उस दिन क्लास में उन्हीं फटे पन्नों को लेकर जाने वाला है?
आप सोच रहे होंगे कि यह क्या बेवकूफी है? लेकिन, यह सच है क्योंकि अगर आपका बच्चा भी इस वर्ष पुणे के कैम्प इलाके के हचिंग्स हाईस्कूल में पढ़ रहा होता तो उसे भी ऐसा ही करना पड़ता। यहां पर पढ़ने वाले बच्चे टीचर के निर्देश के हिसाब से अपनी किताबों से उन हिस्सों को फाड़कर लेकर आते हैं। उन्हें स्कूल में सिर्फ उस दिन के लिए बताए गए विषय के फटे हिस्सों को लेकर आना होता है। बहाना यह है कि स्कूल प्रबंधन केंद्र के निर्देशों के अनुसार बस्तों का वजन घटाने की कोशिश कर रहा है।
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की गाइडलाइन के मुताबिक पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के लिए स्कूल बैग का वजन 1.5 किलो से ज्यादा नहीं हो सकता है। तीसरी से चौथी कक्षा के लिए वजन 2 से 3 किलो, जबकि छठी और सातवीं के लिए 4 किलो, आठवी और नवीं के लिए 4.5 किलो और दसवीं कक्षा के लिए 5 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इसके लिए सरकार ने किताबों के आकार में भी बदलाव किया है। पुणे जिला परिषद भी स्कूल बैग का वजन घटाने के लिए किताबों को छोटी कर रही है। दिलचस्प यह है कि वजन कम करने के लिए कोई नया तरीका सोचने की बजाए, साल के बीच में हचिंग्स स्कूल पालकों पर दबाव डाल रहा है कि बच्चे चैप्टर फाड़कर लाएं। पालकों को किताब फाड़ने के इस नए चलन के बारे में न सिर्फ लिखित में आदेश दिया गया है, बल्कि यह नियम भी बना दिया है कि जो बच्चे फटे हुए चैप्टर लेकर नहीं आएंगे तो उन्हें सजा दी जाएगी! विडम्बना है कि जहां देश के बाकी स्कूलों में बच्चों को किताबों को अच्छी दशा में रखने के लिए पुरस्कार दिया जाता है, वहीं यहां उन्हें इस बात के लिए सजा मिलती है कि उन्होंने किताबें क्यों नहीं फाड़ीं!
यहां के कुछ बच्चों के पालक इस बात में आस्था रखते हैं कि किताबें ‘देवी सरस्वती’ का रूप होती है। इसीलिए पालक उन्हें फाड़ने के बाद हर एक विषय के अलग-अलग हिस्सों को संभालने की परेशानी से बचने के लिए संबंधित चैप्टर की फोटो कॉपी करवाकर भेज रहे हैं। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि किताब फाड़ने की गलत आदत सीख रहे बच्चे बड़े होकर जिम्मेदार नागरिक कैसे बन पाएंगे? भारत समेत लगभग हर एक संस्कृति में किताब एक प्रोडक्ट, सामान या कोई बेजान चीज से बढ़कर मानी जाती है और उन्हें बड़े-बूढ़ों की तरह ज्ञान का भंडार समझा जाता है।
फंडा यह है कि  जीवन के बुनियादी नियम कभी नहीं बदलते, खासतौर पर उन बच्चों के लिए जो अपने शिक्षकों और पालकों से जीने के नए सबक सीख रहे होते हैं।

Leave a Reply