कैसे 2062 तक दुनिया पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित होगी और तब तकनीक की भाषा सर्वोपरि होगी

पश्चिम बंगाल के वनविभाग ने 30 जुलाई को संविदा आधार पर 10 हजार रुपए मासिक तनख्वाह वाले वनसहायकों के दो हजार पदों पर भर्ती का विज्ञापन निकाला। पर इसमें एक शर्त थी। विज्ञापन में लिखा था कि 100 में से 60 अंक प्रतिभागी के बांग्ला में लिखने-पढ़ने की क्षमता के मूल्यांकन पर आधारित होंगे।
आप सोच सकते हैं कि इसमें गलत क्या है? पर सिर्फ स्थानीय लोगों ने ही नहीं बल्कि कई राजनीतिक पार्टियों ने इस पर आपत्ति उठाई कि बांग्ला मीडियम से पढ़ाई नहीं करने वाले छात्र इस नौकरी से वंचित रह जाएंगे। और इस शुक्रवार को वनविभाग ने विज्ञापन संशोधन जारी करते हुए किसी भी आधिकारिक राज्य भाषा की अनुमति दे दी है।
इन दिनों मैं टोबी वाल्श की किताब ‘2062’ पढ़ रहा हूं, इसमें बताया गया है कि कैसे 2062 तक दुनिया पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित होगी और तब तकनीक की भाषा सर्वोपरि होगी।
टोबी अपनी किताब में दावा करते हैं कि बोलचाल की भाषा के विकास से पहले हमारी सीखने की क्षमता सीमित थी। कुछ सिखाने के लिए घर के बुजुर्गों को हर चीज़ करके दिखानी पड़ती थी, यह प्रक्रिया धीमी और कष्टदायी भी थी। ऐेसे में ना चाहते हुई भी कई लोगों का ज्ञान उनकी मौत के साथ ही दफ्न हो गया। और फिर भाषा का विकास हुआ, शोधकर्ताओं के मुताबिक तमिल सबसे प्राचीन भाषा है। टोबी दावा करते हैं कि दूसरे जीवों की कोई आम भाषा नहीं है, इसलिए उनका विकास नहीं हो सका। भाषा लिखने का प्रभाव यह हुआ कि इसने इंसान को दुनिया पर अपना वर्चस्व कायम करने की ललक पैदा कर दी। भाषा बोलने और लिखने ने, सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाया। बाद में प्रिटिंग प्रेस ने एक ही समय पर हजारों लोगों को सीखने की सामग्री उपलब्ध कराकर क्रांति कर दी। इस तरह मानव जाति ‘निएंडरथल्स’ से ‘होमो सेपियन्स’ बन गई।
पर अब आने वाले सालों में हम ‘होमो सेपियंस’ पूरी तरह से ‘होमो डिजिटल्स’ बनने के लिए तैयार हैं। एक कंप्यूटर कोड होगा, जिसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जा सकेगा और इसे लाखों लोगों को आगे ट्रांसफर किया जा सकेगा जैसे कि एपल फोन अपने मालिक को उसकी आवाज से पहचानता है और उसके आदेशों का पालन करता है। कल्पना करें कि इंसान होकर भी आप स्मार्टफोन या कम्प्यूटर की गति से कुछ सीखेंगे! और यह सब 2062 तक होने जा रहा है, तब की ‘होमो डिजिटल’ पीढ़ियां आज भाषा के नाम पर भावनात्मक होने वाले हम ‘होमो सेपियंस’ की जगह ले लेंगी।
युनिवर्सल कम्प्युटिंग मशीन दो अवधारणों पर आधारित हैं- ‘डाटा’ और ‘प्रोग्राम।’ इसे किसी रेसिपी की तरह सोचें। समस्या सुलझाने (डिश बनाने) के लिए कम्प्यूटर डाटा (रेसिपी) लेता है और प्रोग्राम (कुकिंग) का पालन करता है। आपकी जेब में मौजूद स्मार्टफोन का भी यही राज है। यह नए एप्स के साथ, जिन्हें हम प्रोग्राम कहते हैं, नए काम पूरा करने की अनुमति देता है। सोचिए अगर फोन को लगे कि वह अपने मालिक की कुछ काम में मदद नहीं कर पा रहा है और फोन खुद ही बाजार से एक प्रोग्राम खोजकर उस चीज़ को सीखने के लिए खुद को अपडेट कर ले, तब कहा जाएगा कि यह मशीन ‘आर्टफिशियल इंटेलिजेंस’ पर काम कर रही है!
फंडा यह है कि: याद रखें कि बच्चों ने इस महामारी के कारण अपने फोन और कम्प्यूटर पर सीखना शुरू कर दिया है, शायद यह ‘होमो डिजिटलिस’ बनने की दिशा में पहला कदम है।

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