खुलते ही मंदिर जाने के बारे में आपकी क्या राय है?

Management Funda by N. Raghuraman

यह शायद 30 साल पुरानी कहानी है। उस जमाने में सफल लेबर लॉ विशेषज्ञ जे नारायणनन ने बॉम्बे में ऐसी जगह पर अपना बड़ा फ्लैट 2.5 लाख रुपए में बेचा था, जहां आज ज्यादातर बॉलीवुड स्टार रहते हैं। फ्लैट बेचकर वे परिवार के साथ मद्रास चले गए। इतने वर्षों में बॉम्बे मुंबई बन गया और मद्रास चेन्नई।

उन्होंने जो फ्लैट बेचा था उसकी कीमत करोड़ों में हो गई। लगभग 25 साल बाद जब वे मुंबई आकर मेरे घर रुके तो मैंने उन्हें उनके पुराने घर ले जाने का वादा किया। उन्होंने तुरंत यह कहते हुए मना कर दिया कि ‘हो सकता है कि यह सोचकर मेरे मन में वास्तविक खरीदार के प्रति दुर्भावना आ जाए कि उसने मुझसे कितनी कम कीमत में घर खरीद लिया था या उसने इससे कितनी कमाई कर ली।

चूंकि तब उसने मेरी मदद की थी, तो मैं वहां जाकर उसे बुरी अनुभूति करवाकर दु:खी नहीं करना चाहता। आखिर मैं भी इंसान ही हूं।’ मैं उनके इस विचार से हैरान रह गया और मुझे यह सोमवार को एक अलग कारण से याद आया। आठ महीने बाद, 16 नवंबर को महाराष्ट्र में सख्त कोविड गाइडलाइंस के साथ धार्मिक स्थल खुल गए। मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर ने प्रतिदिन 1000 भक्तों की अनुमति दी है, वह भी मोबाइल एप के जरिए बुक किए गए अलग-अलग टाइम स्लॉट में। जबकि कोविड से पहले चार अलग-अलग लाइनों से होते हुए हर मिनट 100 लोग दर्शन करते थे। जब मैंने भीड़ प्रबंधित करनेे के मंदिर के इस प्रयास के बारे में सुना तो मुझे सबसे पहले मेरे दोस्त के ड्राइवर का ख्याल आया, जिसने भगवान गणेश से प्रार्थना की थी कि अगर उसकी 11 वर्षीय बेटी कोविड की परेशानियों से बच जाएगी तो वह सिद्धिविनायक मंदिर के खुलने के पहले दिन ही दर्शन के लिए जाएगा। उसकी बेटी ठीक हो गई। एक अलिखित समझौते के तहत ईश्वर ने डॉक्टरों के जरिए अपना वादा निभाया। अब वादा निभाने की उसकी बारी है। मेरे मन में यही विचार आया कि मुंबई की भीड़ में ऐसे कितने गणेशभक्त होंगे जिन्हें नौकरी खोने के बाद फिर मिली होगी, या वित्तीय संकट में सबकुछ खोने के बाद कुछ पैसे मिले होंगे, या परिवार के किसी न किसी सदस्य को कोरोना के चंगुल से निकालकर लाए होंगे। उनमें से कई ने कोई मन्नत मांगी होगी। और वो मन्नत यह भी हो सकती है ईश्वर के द्वार खुलते ही वे दर्शन के लिए जाएंगे। सौभाग्य से मैं इन लोगों की तुलना कम प्रभावित हुआ था। यही कारण है कि मैंने फैसला लिया है कि मैं मंदिर खुलते ही, तुरंत दर्शन के लिए नहीं जाऊंगा, ताकि मैं उस व्यक्ति को पहले अवसर दे सकूं, जिसने ईश्वर से उस जगह जाकर दर्शन करने का वादा किया है, जहां वे विराजमान हैं। मैं जानता हूं कि मेरा त्याग किसी जाने-अनजाने व्यक्ति को खुशी देगा।

ईश्वर के साथ एक परिपक्व मानसिक संबंध के लिए सिर्फ दर्शन नहीं, बल्कि आत्मा में उनका निवास होना जरूरी है। मैं मानता हूं कि मेरे साथी मेरे कर्मों को देखकर मेरे बारे में राय बनाएंगे, पर ईश्वर मेरी मंशा देखेंगे। और मैं यह भी जानता हूं कि मुझे उनका ‘बुलावा’ आएगा। जब भी कोई अवसर मिलते हैं, तो ये पहले उन्हें मिलने चाहिए, जिन्हें इनकी वाकई में ईमानदारी से जरूरत है। यह आपके उन अंदरुनी विचारों के साथ समरसता बैठाने का सबसे अच्छा तरीका है, जो आपके हृदय में रह रहे ईश्वर से प्रकट होते हैं।

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