खुली मुट्ठी खाक की , बंद मुट्ठी लाख की

मानसून केरल पहुंचने पर खेती-किसानी से जुड़े काम शुरू हो गए। यहां कोच्चि से कुछ दूरी पर अलुवा कस्बे के चूरिनिक्करा में भी ऐसा ही दृश्य है। यह पढ़कर आप यह न सोचें कि ‘बारिश में तो बारिश वाले ही काम होंगे, दूसरा काम कोई और क्या करेगा?’
जब हर साल मानसूनी बारिश पूरे देश को भिगोती थी तो इस छोटे से कस्बे में कुछ ऐसी गतिविधियां होती थीं, जिन्हें लोग खेती से ज्यादा अहम मानते थे। यहां के कुछ लोगों ने विकास के नाम पर अपनी जमीन बेच दी थी, कुछ इंतजार कर रहे थे कि कोच्चि मेट्रो वाले उनकी जमीन ले लें, जबकि कुछ तो ऐसे भी हैं जिनकी जमीन कचरे का डम्पिंग ग्राउंड बन रही थी। किसी बड़े शहर की तरह चूरिनिक्करा भी शहरीकरण की चपेट में आता जा रहा था।
यहां के लोग अपने धान के छोटे से खेत को कचरे का मैदान बनने के लिए छोड़कर पास के शहरों की ओर पलायन करते जा रहे थे और उनके ऐसा करने से प्रशासन इसलिए खुश था, क्योंकि उसे मेट्रो सिटी के बाहर कचरा जमा करने की जगह मिल रही थी। लोग इसलिए भी खेती से दूर जा रहे थे, क्योंकि उनके पास थोड़ी जमीन थी। कुछ के पास तो एक एकड़ का सिर्फ पांचवां हिस्सा था। खेती-किसानी में घटते रुझान के कारण ही बीते वर्षों में यहां की मेट्रो रेल अथॉरिटी ने जमीन खरीदकर उस पर कार शेड बना लिए।
लेकिन इंजीनियरिंग, आईटी और कंस्ट्रक्शन जैसे अलग-अलग बैकग्राउंड से आए उन 17 युवाओं ने इस सोच को बदल दिया। तीन साल पहले ये साथ आए और इन्होंने करीब 100 एकड़ बंजर और कचरे से पटे धान के खेत को उपजाऊ बना दिया है। खेती का जुनून लिए ये युवा कोच्चि से बाहर स्थानीय लोगों और पूरी पंचायत के हीरो बन गए हैं। इन सभी 17 युवाओं ने 2016-17 में सबसे पहले ‘अदयालम’ नामक स्वयं सहायता समूह बनाया, और 40 लोगों से 15 एकड़ से ज्यादा जमीन लीज पर ली। उन्होंने केरल के कृषि विभाग और वैज्ञानिकों से जरूरी मार्गदर्शन प्राप्त किया और करीब तीन साल तक जुटे रहे। उन्होंने अपनी बचत से 10 लाख रुपए खर्च किए और करीब 15 एकड़ जमीन पर फैले और सड़ रहे कचरे को साफ किया। इस टीम ने यहां के एग्री यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड साइंटिस्ट डॉ एनके शशिधरन को अपना ‘गॉडफादर’ बनाया और पूरी लगन से उनकी सलाह पर अमल किया। पहले साल में उन्होंने 15 एकड़ जमीन से करीब 8 टन धान की अच्छी उपज ली। उन्होंने ‘चूरिनिक्करा राइस’ के नाम से इसकी ब्रांडिंग की और लोकल मार्केट में इसे 35 रुपए किलो के हिसाब से बेचा। जमीन मालिकों को उनकी जोत के हिसाब से 20 फीसदी हिस्सा दिया।
इस हरित क्रांति की वजह से पूरी पंचायत में जमा हो रहे कचरे के समाधान के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई। ‘अदयालन’ ने यहां पर प्लास्टिक के कचरे को जमा करने में मदद की और उसे रिसाइक्लिंग यूनिट में भेजना शुरू किया। पहले यहां के कुओं का पानी पीने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता था लेकिन अचानक पहले ही साल में लोग कुओं का पानी पीने लगे। इससे हर कुएं के पानी का स्तर भी बढ़ा और करीब 8,000 घरों में आई जागरुकता के कारण अलगे साल से पूरा परिदृश्य बदल गया। अपनी जमीनों को लावारिस छोड़कर गए लोग लौटने लगे और इन 17 युवाओं की नकल करने लगे, कुछ ने तो अपनी जमीन उन्हें लीज पर दे दी। इस तरह इस साल तक उनके पास 100 एकड़ लैंड बैंक हो चुका है। यही कारण है कि इस बार की बारिश में यहां खेती से जुड़ी खूब गतिविधियां देखी जा रही हैं। जब यहां की जमीनें कचरे से पटी हुईं थी तो बदमाशों के डर से कोई भी वहां शाम को जाना पसंद नहीं करता था। आज ये जमीनें साफ-सुथरी और हरी-भरी हो गई हैं इसीलिए लोग परिवार के साथ घूमने-फिरने आने लगे हैं।
फंडा यह है कि  अकेले बदलाव नहीं ला सकते तो अपनी सोच वाले लोगों से जुड़कर देखें सामूहिक शक्ति का कमाल। आप नया ब्रांड ला सकते हैं जैसा केरल में हुआ।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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