जीवन में संकट के समय अपने गोल को बेहतर बनाने की एक कोशिश जरूर करनी चाहिए

Management Funda by N. Raghuraman

वर्तमान कोरोना संकट में मेरे बहुत से जानने वालों ने मान लिया है कि हम इन अकल्पनीय हालातों के अभागे शिकार हैं और अब अपनी महात्वाकांक्षाओं को कम करते हुए हमें अपनी गोल शीट पर फिर से काम करने की जरूरत है। अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो यहां एक कहानी है जो शायद आपको अलग सोचने के लिए प्रेरित करे।

बचपन से ही वह बीमार रहता था, इसलिए उसे अक्सर डॉक्टर्स के पास जाना पड़ता था। चूंकि अपने पूरे बचपन में उसका वास्ता एप्रिन पहने दयालु लोगों से हुआ, इसलिए उसका भी सपना था कि वह डॉक्टर बने। पर 5 साल पहले उसे नहीं पता था कि 19 साल की उम्र में उसकी जिंदगी बदतर होकर यू टर्न लेने वाली है। वह भुवनेश्वर के कॉलेज में डेंटिस्ट्री की पढ़ाई कर रहा था, जब पश्चिम बंगाल के बर्दवान स्थित अपने घर में चक्कर आने के बाद वह बाथरूम में गिर पड़ा।

अगले दो दिनों में वह सबकुछ भूलने लगा। आसपास के लोगों को नहीं पहचान पा रहा था, तब उसके माता-पिता उसे कोलकाता के अस्पताल लेकर भागे। डॉक्टर्स ने ‘craniectomy’ सर्जरी की। इस न्यूरोसर्जरी में दिमाग पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए स्कल का एक हिस्सा निकाल दिया जाता है। इसके बाद वह एक तरफ से लकवाग्रस्त हो गया। और इसी तरह से वह पिछले पांच सालों से जी रहा था।

ऑपरेशन के बाद घर आने पर उसे संक्रमण हो गया और वह ठीक हो गया, लेकिन उसकी हडि्डयों का घनत्व व हडि्डयों का वज़न सबसे निम्नतम स्तर पर चला गया। इस दौरान जांघ की हड्‌डी में फ्रैक्चर हो गया। इसके चलते उसे महीनों बिस्तर पर रहना पड़ा। उसके पैरों-बाएंं हिस्से को ठीक करने के लिए डॉक्टर्स और फिजियोथैरेपिस्ट के साथ संघर्ष का दूसरा दौर शुरू हुआ।

तब उसे बर्दवान के ही एसएसकेएम मेडिकल कॉलेज के फिजिकल मेडिसिन और रिहेबिलिटेशन डिपार्टमेंट में भेजा गया। अगले कुछ साल तक धैर्य खोए बिना डॉक्टर्स लगातार कोशिश करते रहे। उसने धीरे-धीरे प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। उसका बायां हाथ हिलने लगा और उसके बाद पैर भी। स्वाभाविक था कि इस सब उपचार के बीच उसकी डॉक्टर्स के पास जाने की फ्रीक्वेंसी बढ़ गई और अपनी गोल शील बदलकर डेंटिस्ट से डॉक्टर बनने की उसकी इच्छाशक्ति भी बढ़ गई!

3 साल पहले उसने राष्ट्रीय योग्यता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) दी, लेकिन फेल हो गया। इस साल उसने विकलांग कोटा में 789 रैंक के साथ नीट पास कर ली। और इस सोमवार को, वह उसी एसएसकेएम हॉस्पिटल में मेडिकल बोर्ड के सामने उपस्थित हुआ, जहां उसका इलाज चल रहा है और जिसने बीमारी के चलते उसकी विकलांगता निर्धारित की थी।

इंटरव्यू में चेहरे पर मुस्कान लिए वह खड़ा रहा। यह सिर्फ उसके डॉक्टर्स के लिए फुल सर्किल नहीं था, पर 24 साल के सोमेन्दु रुद्र के लिए भी था, जिसने एमबीबीएस में दाखिला से पहले अंतिम बाधा पार कर ली थी! उसके संघर्ष में साथ खड़े लोगों से मिल रही शुभकामनाएं अभी भी जारी हैं और वह उम्मीद कर रहा है कि उसे अपने घर के नजदीक इसी मेडिकल कॉलेज में सीट मिल जाए।

हालांकि उसकी गोल शीट बदल गई है। अब वह डेंटिस्ट नहीं बनेगा, बल्कि सर्जन बनना चाहता है। सर्जरी के लिए जरूरी ताकत हासिल करने वह ईश्वर से प्रार्थना और कड़ी मेहनत करेगा।

फंडा यह है कि अगर जीवन में संकट गोल शीट पर फिर से काम करने का दबाव बनाएं, तो हमें कम से कम एक बार उसे बेहतर बनाने की दिशा में कोशिश करनी चाहिए। कौन जानता है कि हम भी सोमेन्दु जैसे एक हो सकते हैं। – एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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