‘छोटी-छोटी सी बात’ से बनती है खुशहाल ज़िंदगी

सत्तर के दशक में जब मुझे पता चला था कि हम बॉम्बे (अब मुंबई) रहने जा रहे हैं, तो मेरे अंदर जैसे अरुण प्रदीप की आत्मा समा गई। अरुण की एक कम्पनी में ग्रैड-टू सुपरवाइजर के रूप में नई-नई नियुक्ति हुई थी। अगर आपने वह दौर देखा हो, तो मैं शर्त लगा सकता हूं कि आप अरुण प्रदीप को अच्छी तरह जानते होंगे। मुझे भी मुंबई में पहला जॉब बतौर सुपरवाइजर ही मिला था, इसलिए अरुण में अपने आपको देखना मेरे लिए आसान है। सबसे बड़ा संयोग तो यह था कि मैं भी उसी नंबर की बेस्ट की बस से दफ्तर जाता था, जिससे अरुण जाता था, बस फर्क इतना है कि वह रील लाइफ में जबकि मैं रीयल लाइफ में जाता था। अरुण में अपने जैसी समानता ढूंढ़ना, किसी और कारण से नहीं बल्कि सिर्फ इसलिए था कि वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ उस बस में यात्रा करता था।
मेरी उम्र के युवाओं का उससे जुड़ाव का एक और कारण था कि वह दूसरे बॉलीवुड हीरो की तरह महंगे होटलों और विदेशी लोकेशन्स की बजाय, साधारण बस में रोमांस कर रहा था। उसके रोमांस में रोड किनारे वाले स्टॉल पर खाना, अपनी गर्लफ्रेंड प्रभा के लिए सस्ते तोहफे खरीदना शामिल था और गर्लफ्रेंड भी छोटी-छोटी चीजें पाकर खुश रहती थी। अरुण जब प्रभा से पहली बार मिला था तो, वह बस स्टैंड पर बस नंबर 86 के इंतजार में खड़ा था। यह बस अरुण के दफ्तर के रास्ते से थोड़ा घूमकर, प्रभा के दफ्तर तक जाती थी। अरुण हमेशा दफ्तर तक उसके पीछे जाता था और अपने दफ्तर पहुंचने में लेट हो जाता था।
अगर किसी को 1970 के दौर के उस बॉम्बे शहर को यादों को ताजा करना है, जिसमें हम जीते थे, जहां प्यार बेस्ट की बसों में, गलियों में, कतारों में, पानी पुरी के स्टॉल पर, बांद्रा के गुजरे दौर के कैफे में, गेटवे ऑफ इंडिया के बैकग्राउंड में एक छोटे से रेस्तरां में काल्पनिक मुलाकातों (इमेजनेरी डेट) पर, जहांगीर आर्ट गैलरी के टूर पर, पम्पोश रेस्तरां में लंच पर और अल्मेडा पार्क में परवान चढ़ता था; अगर इन सब यादों को एक ही पैकेज में समेटना हो तो, बासु चटर्जी की फिल्म ‘छोटी सी बात’ आपके लिए कल्पनाओं और हक़ीक़त देखने के लिए एंट्री टिकट होगा। आप अब तक समझ गए होंगे कि अरुण प्रदीप कौन है! जी हां, वे अमोल पालेकर हैं और उनकी गर्लफ्रेंड हैं – विद्या सिन्हा, जो एक मध्यमवर्गीय परिवार की लम्बे बालों वाली एक शर्मीली, फिक्रमंद और पारिवारिक लड़की है। दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें इस स्वतंत्रता दिवस के दिन खो दिया। आपने आखिरी बार कब ऐसा देखा था कि एक हिंदी फिल्म भीड़ भरे बस स्टॉप के इर्द-गिर्द आकार ले रही है? अपने निर्माण के 43 साल बाद भी, फिल्म ‘छोटी सी बात’ वाला रोमांस आज की शहरी ज़िंदगी में ढूंढ़े नहीं मिलता है।
उन्हीं यादों के बीच, मैं आज के युवा जोड़ों को डिजाइनर ड्रेसेस पहनें स्टारबक्स में जाते देखता हूं जहां सिर्फ कॉफी पर 200 रुपए खर्च होते हैं और वे ऐसे फाइव स्टार रेस्तरां में डिनर डेट पर जाते हैं, जहां एक प्लेट का खर्च मेरी उन दिनों की महीने भर की सैलेरी के बराबर है। मुझे देखकर खुशी होती है कि वे अपनी ऐसी ‘डेट्स’ को एक्सक्लूसिव और संपन्न बनाने में समक्ष हैं लेकिन, आप सिर्फ 1 रुपए के गजरे का तोहफा देने के दौरान हुए उस अकस्मात स्पर्श को क्या कहेंगे, जो पूरे शरीर में एक आवेग से भर देता था? मैं बस स्टैंड पर इंतजार के उन घंटों को शब्दों में बयां नहीं कर सकता, जब किताब पढ़ने का नाटक सिर्फ इसलिए किया जाता था कि गर्लफ्रेंड भीड़ में अपने उस युवा प्रेमी को ढूंढ़ सके जो हमेशा किताब उलटी पकड़े होता था। ‘ना जाने क्यूं…’ गाने के बैकग्रांउड में विद्या और अमोल ऐसे ही हल्के-फुलके और खुशियों भरे छोटे-छोटे पलों को जीभर के जीते नज़र आते हैं।
फंडा यह है कि  खुशियों भरी ज़िंदगी महंगी चीजों से नहीं बल्कि ‘छोटी सी बात’ से बनती है! इसलिए ऐसी छोटी बातों का खूब मजा लीजिए। वे वाकई मायने रखती हैं।

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