जब आप एसपी बालासुब्रमण्यम की तरह अपने हुनर से कमाते हैं तो वह काम या नौकरी जैसा नहीं लगता, बल्कि जिंदगी जीने जैसा लगता है

डिक्शनरी में ‘टैलेंट’ (हुनर) शब्द का अर्थ है किसी व्यक्ति की स्वाभाविक प्रतिभा। यह हमारा कौशल या स्वाभाविक क्षमता है। हम सभी में ये होती हैं, लेकिन हम पहचान नहीं पाते कि वे क्या हैं। जब युवा मुझसे पूछते हैं कि वे अपना हुनर कैसे पहचानें तो मैं कहता हूं कि वे अपने आस-पास के लोगों से उनका ईमानदार मूल्यांकन करने को कहें। कभी-कभी ये हुनर हमारे सामने ही होते हैं, लेकिन हम देख नहीं पाते। हममें से ज्यादातर उन्हें तब नहीं पहचान पाते, जब हम युवा होते हैं। जैसे हमारे पार्श्व गायक एसपी बालासुब्रमण्यम, जिन्हें प्यार से बालू भी कहते थे।

बालू का सपना अपने पिता की महत्वाकांक्षा पूरी कर इंजीनियर बनना और सरकारी नौकरी पाना था। उन्होंने कभी गायक बनने का नहीं सोचा था और न ही उन्होंने बचपन से इसकी कोई ट्रेनिंग ली थी। उनका कॉलेज के दिनों में गायकी के प्रति झुकाव हुआ। आंध्रप्रदेश के अनंतपुर से इंजीनियरिंग करने के दौरान बीमारी की वजह से उन्हें एक साल के लिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी। तब उन्हें विभिन्न गायन प्रतियोगिताओं में भाग लेने का समय मिला। एक बार उन्हें आंध्रप्रदेश में नीबुओं के लिए प्रसिद्ध गुडुर के कालिदास कलानिकेतन में एस जानकी के सामने गाने का मौका मिला, जो तब प्रसिद्ध गायिका बन चुकी थीं और बाद में ‘नाइटेंगेल ऑफ साउथ इंडिया’ के नाम से जानी गईं। चूंकि वे आंध्र से ही थीं, इसलिए उन्हें युवा हुनरमंदों को जज करने के लिए बुलाया गया था। बालू को दूसरा पुरस्कार मिला।

किसी कारण जानकी को लगा कि बालू का प्रदर्शन पहला पुरस्कार जीतने वाले से बेहतर था और इसलिए उन्होंने बालू से फिल्मों में गाने को कहा। बालू हंस पड़े और बोले कि उन्होंने संगीत का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है। लेकिन जानकी ने उनका यह कहकर उत्साह बढ़ाया कि उन्होंने भी बहुत कम सीखा है, लेकिन इसने उन्हें बतौर गायक कॅरिअर बनाने से नहीं रोका।

बालू ने फिर चेन्नई से इंजीनियरिंग की आगे की पढ़ाई की, जहां वे कई म्यूजिक डायरेक्टर से मिले और सभी जगह खारिज कर दिए गए। बालू ने गायकी छोड़ने का फैसला लिया। लेकिन उनके रूममेट मुरली से चुपचाप बालू का नाम आंध्र सोशल कल्चरल एसोसिएशन की प्रतियोगिता में लिखवा दिया। प्रतियोगिता का नियम यह था कि संगीत और बोल, दोनों मूल होने चाहिए। उनके दोस्त ने मजबूर किया कि वे इसमें भाग लें, जहां शीर्ष संगीतकारों को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया था। चूंकि गायकों को अल्फाबेट के क्रम में चुना गया, इसलिए सबसे पहले बालू का नाम आ गया।

उन्होंने प्रस्तुति दी और दर्शकों में चुपचाप बैठ गए। तब एक जज का असिस्टेंट उनके पास आया और पूछा कि क्या वे फिल्म के लिए गाएंगे। बालू उसकी ओर देखकर आंखों ही आंखों में बोले, ‘यार क्यों मजाक कर रहे हो!’ एक हफ्ते बाद उन्हें संगीत निर्देशक एसपी कोडंडापानी के सामने ऑडिशन के लिए बुलाया गया, जिन्होंने उन्हें फिर रिजेक्ट कर दिया।

तब तक बालू को लगने लगा कि इंजीनियरिंग ही उनका पेट भरेगी। लगभग 18 महीने बाद, जब बालू अपने कैंपस में थे, 1966 में कोडंडापानी उन्हें खोजते हुए पहुंचे। बहुत बाद में पूरे भारत ने उनके साथ साजन फिल्म का गाना ‘देखा है पहली बार’ गाया। 16 भाषाओं में गाए गए करीब 40 हजार गानों के साथ बाकी इतिहास है। इस शुक्रवार उन्होंने अंतिम सांस ली।

फंडा यह है कि जब आप एसपी बालासुब्रमण्यम की तरह अपने हुनर से कमाते हैं तो वह काम या नौकरी जैसा नहीं लगता, बल्कि जिंदगी जीने जैसा लगता है।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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