जब इंसान अच्छा-बुरा तय करने में नैतिकता से ज्यादा मानवता पर जोर देता है तो उसे बेहद संतोष मिलता है

जो हमारे लिए अच्छा है, वह हो सकता है औरों के लिए अच्छा न हो और इसका उलटा भी हो सकता है। ऐसा मुख्यत: इसलिए होता है क्योंकि हम सभी अलग-अलग समाजों में पले-बढ़े हैं, जिनकी अलग-अलग सोच है। संक्षेप में, हम मानते हैं कि हम जो भी करते हैं या देखते हैं, उसके अच्छे-बुरे होने का प्रमाणीकरण सामाजिक संस्कृतियां करती हैं। जैसे-जैसे समाज बदलता है, कुछ कार्यों को अच्छा या बुरा मानने का फैसला भी बदलता रहता है। यह शायद एक मुख्य कारण है कि कई बार बच्चे माता-पिता द्वारा किसी काम को अच्छा बताने से सहमत नहीं होते। इसलिए सद्गुरु कहते हैं कि किसी कार्य को अच्छा या बुरा प्रमाणित करना मानवता पर आधारित होना चाहिए, नैतिकता पर नहीं। यह रहा इसका एक उदाहरण।

ज्यादातर मुंबईकर 29 अगस्त 2017 को हुई घटना भूले नहीं हैं। तब मूसलाधार बारिश हो रही थी, जैसी इस साल अगस्त के पहले हफ्ते में हुई है। चूंकि परेल में सड़कों पर पानी भर गया था, इसलिए स्थानीय लोगों ने मैनहोल का ढक्कन खोल दिया ताकि पानी निकल जाए क्योंकि कार और बाइक बाढ़ में बह रही थीं। उन्होंने वहां कोई चेतावनी का बोर्ड नहीं लगाया और चले गए। दुर्भाग्य से, मशहूर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ दीपक अमरापुरकर उसमें गिर गए और उनकी लाश दो दिन बाद कुछ किलोमीटर दूर मिली।

तीन साल बाद, इसी अगस्त महीने में मुंबई में मूसलाधार बारिश हुई। दशकों पहले फुटपाथ को अपना घर बना चुकी, फूल बेचने वाली कांता मुरली कालन ने 3 अगस्त की रात अपनी दोनों बेटियों, जानकी (आठवीं की छात्रा) और तमिलश्री (दसवीं की छात्रा) व फुटपाथ पर रहने वाले अन्य लोगों के साथ चिंता में बिताई। अगली सुबह तक सड़क और फुटपाथ 3 फीट से ज्यादा पानी में डूब चुके थे। वहां खड़ी गाड़ियां बहने लगी थीं। कांता ने तय किया कि उसे खुद ही इसका हल ढूंढना होगा।

चार अगस्त को सुबह 6 बजे से कुछ देर पहले उसने एक मोटा कपड़ा लिया और उसे मैनहोल के ढक्कन के हुक में बांध दिया, जो कुछ ही दूर था। फिर वहां से बाइक पर गुजर रहे एक आदमी की मदद से उसने जोर लगाकर ढक्कन खोला, ताकि पानी निकल जाए। वह वहां से जाकर अपना टेंट और सामान बचा सकती थी, लेकिन यहां कांता अलग साबित हुई। वह बारिश में खड़ी रही और सुबह 6 से दोपहर 1 बजे तक ट्रैफिक हटाती रही, ताकि 2017 जैसा कोई हादसा न हो। लेकिन नि:स्वार्थ भाव से किए गए काम की उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। जब वह फुटपाथ पर लौटी तो उसका सारा सामान बह चुका था, जिसमें वे 10 हजार रुपए भी थे, जो उसने अपनी बेटियों की ऑनलाइन क्लास में मदद के लिए इकट्‌ठे किए थे।

उसने वही किया जो उसकी आत्मा को सही लगा। वह इस बात से अनजान थी कि सड़क की दूसरी तरफ, ऊंची इमारतों में रह रहे कई अमीर उसका वीडियो बना रहे थे। अगले दिन उसे वायरल बुखार हो गया। उसका वीडियो भी वायरल हो गया। मैनहोल खोलने पर उसे म्युनिसिपल अधिकारियों का गुस्सा झेलना पड़ा, वहीं पुलिस अधिकारियों ने उसकी तारीफ की क्योंकि उसने अपना सबकुछ खोकर भी कई जानें बचाईं। आज वह इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित है कि वह अपनी और बेटियों की जिंदगी फिर से पटरी पर कैसे लाएगी।

फंडा यह है कि ऐसा लगता है कि जब इंसान अच्छा-बुरा तय करने में नैतिकता से ज्यादा मानवता पर जोर देता है तो उसे बेहद संतोष मिलता है।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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