जब बात जिंदगी की गुणवत्ता और स्तर की होगी, तो हर घर में मतभेद तो होंगे ही

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हर पीढ़ी कुछ हासिल करती है। हमारे माता-पिता ने हमें मूलभूत सुविधाएं देने और हमारी अच्छी सेहत सुनिश्चित करने के लिए मेहनत की। फिर जब हमारी पीढ़ी को जिम्मेदारी मिली तो हमने खुद को और माता-पिता को सहूलियतें देने के लिए सुविधाएं और सामान जोड़े। लेकिन अब हमारे बच्चे न सिर्फ अपने जीवन में बल्कि अपने बिजनेस और उन उत्पादों में भी गुणवत्ता जोड़ रहे हैं, जो वे दूसरों के लिए बनाते हैं।

पणजी, गोवा के 58 वर्षीय उदय प्रभु देसाई का ही मामला देखें। उनकी बेटी ने हाल ही में दापोली, महाराष्ट्र के कृषि कॉलेज से ग्रैजुएशन पूरा किया और बेटा जैविक खेती में डूबा है। हाल ही में, जब पास की शक्कर फैक्ट्री बंद हुई, तो उनके क्षेत्र के ज्यादातर गन्ना किसानों ने खुद को मुसीबत में पाया। लेकिन दो पीढ़ियों के इस परिवार ने ‘लीप फ्रॉग’ वाली छलांग लगा दी। ‘लीप फ्रॉग’ मैनेजमेंट का शब्द है, जहां एक व्यक्ति पीछे जाता है, आय का नुकसान करवाता है और फिर मेंढक की तरह इतने आगे छलांग लगाता है कि न सिर्फ नुकसान की भरपाई हो जाती है, बल्कि भारी लाभ होता है।

शक्कर फैक्ट्री बंद होने के बाद अन्य किसान गन्ने गोवा के बाहर भेजने लगे। लेकिन देसाई परिवार ने कुछ अलग करने का फैसला लिया। परिवार को अहसास हुआ कि राज्य में जैविक गुड़ के कई उत्पादक हैं, पर उनमें से कोई जैविक गन्ने की खेती नहीं करता। प्रोसेसिंग के दौरान सल्फर और अन्य कैमिकल का इस्तेमाल गन्ने के रस को हल्का बना देता है, जिससे गुड़ में पीलापन आता है। पिछले तीन सालों में देसाई परिवार ने अपने खेत में केमिकल इस्तेमाल नहीं किए, जिससे सुनिश्चित हुआ कि गन्ने की फसल जैविक है। आज उनका गुड़ हल्के काले से लगभग काला तक है।

प्राइवेट यूनिट बनाने में देसाई परिवार के करीब 15 लाख रुपए खर्च हुए। यह अभी गुड़ और सिरप बनाती है। एक किलो ठोस गुड़ और सिरप की कीमत 150 रुपए है, जबकि वे गुड़ पाउडर भी बनाकर 200 रुपए प्रति किलो में बेचना चाहते हैं। देसाई परिवार सही मायनों में ‘आत्मनिर्भर’ बनकर आंत्रप्रेन्योर बन सका क्योंकि अगली पीढ़ी ने, हमारी से पीढ़ी से जिम्मेदारी ली।

इस रवैये से विपरीत, हमारी पीढ़ी को न सिर्फ घर में सामान जोड़ने बल्कि सार्वजनिक जगहों पर कब्जे के लिए भी दोषी ठहराते हैं। यही कारण है कि देश के कई नगरीय निकायों ने अपने घर के सामने गाड़ी खड़ी करने वालों से 5000 रुपए सालाना लेने का फैसला लिया है।

मुंबई ऐसा कदम उठाने वाला और पार्किंग के लिए 5000 रुपए सालाना लेने वाला पहला शहर था। फिर बेंगलुरु, पुणे और अब ज्यादातर शहरों में नगरीय निकायों ने आवासीय पार्किंग परमिट देने की नई अवधारणा अपना ली है।

लेकिन ऐसे परमिटों में शर्तें भी हैं। वे पार्किंग की जगह की गांरटी नहीं देते। जगह उपलब्ध होने पर ही पार्किंग हो सकती है। एक गली के लिए जारी परमिट कहीं और इस्तेमाल नहीं हो सकता। परमिट गाड़ी पर मिलता है, व्यक्ति को नहीं। लेकिन परमिट धारी को उस सड़क पर रहना अनिवार्य है, जहां के लिए परमिट जारी हुआ है।

हर आवेदक एक ही गाड़ी के लिए आ‌वेदन कर सकता है। लेकिन अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों को परमिट नहीं मिलेगा क्योंकि उनके लिए पार्किंग कोऑपरेटिव सोसायटी की जिम्मेदारी है। अब तक मुफ्त मिल रही चीज पर, जब कीमत वसूली जाने लगे तो विरोध स्वाभाविक है। लेकिन यकीन मानिए, हम जितनी चीजें जोड़ते हैं, हमें उतनी कीमत चुकानी होती है।

फंडा यह है कि जब बात जिंदगी की गुणवत्ता और स्तर की होगी, तो हर घर में मतभेद तो होंगे ही, लेकिन समग्र दृष्टिकोण अपनाएं और सभी से चर्चा कर बेहतर फैसला लें।

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