जब बात सार्वजनिक व्यवहार की हो, तो विकसित समाज के लिए सजगता पूर्वक निर्णय जरूरी

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कैसे एक छोटा-सा देश भूटान सबसे खुशहाल राष्ट्र बन गया। इस शुक्रवार को उज्जैन में जैन तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें आचार्य श्री महाश्रमण जी, साध्वी प्रमुखा कनकप्रभाजी, मुनि कुमारश्रमण जी और अन्य मुनियों से निजी भेंट के दौरान मेरे और उनके बीच ये चर्चा का विषय था। घरवापसी की फ्लाइट के लिए इंदौर एयरपोर्ट पर बैठे हुए मेरे मन में यही घूम रहा था कि उस स्तर की खुशी हासिल करने के लिए एक देश के तौर पर हमारे अंदर क्या कमी है।

अचानक एयरलाइन की एक महिला की आदेशात्मक आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘विमान के लिए प्रस्थान शुरू हो गया है। फेसशील्ड पहने बिना प्रस्थान के लिए न आएं, मैं विमान में प्रवेश नहीं करने दूंगी।’ उस महिला के वाक्यों का चुनाव देखें। जैसे कोई मालिक गुलामों से बात कर रहा हो। सेवा उद्योग में अनिवार्य ‘कृपया’ शब्द गायब था।

मुझसे आगे एक 70 साल के बुजुर्ग खड़े थे और उसी महिला ने अपने सहकर्मी से कहा ‘इसका आरटीपीसीआर चैक करना।’ उसने यहां तक कि ‘इनका’ भी नहीं कहा। उन बुजुर्गवार को बुरा लगा। उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘थोड़ी-सी तमीज तो सीख लो।’ उन लोगों ने बुजुर्ग की बातों पर ध्यान ही नहीं दिया और ना सॉरी कहा। बस आगे जाने के लिए कह दिया।

विमान के भीतर मैंने देखा कि वह बुजुर्ग 5डी सीट पर बैठे थे और उनके बगल में 5ई पर 20 साल का नौजवान बैठा था। उन्होंने उससे विमान कंपनी द्वारा दी गई पीपीई किट पहनने की गुजारिश की, महामारी के दौरान किसी भी एयरलाइन में बीच की सीट पर सफर करने वाले यात्री को ये पहनना जरूरी है। लड़के ने ये कहते हुए मना कर दिया कि वह न सिर्फ इसमें जोकर लगेगा साथ ही ऐसी किट में घुटन भी होगी।

उन बुजुर्ग ने बहुत शालीनता से कहा, ‘मेरी ऐसी नाजुक उम्र है, जहां तुम्हारी तुलना में मुझे ज्यादा संक्रमण हो सकता है। कम से कम मेरी सुरक्षा के लिए तुम्हें किट पहननी चाहिए।’ वह युवक टॉयलेट के बहाने अदब से उठा और पीछे की पक्ति में बैठी अपनी महिला मित्र से बात करते हुए कुछ समय बिताया और विमान के लैंड करने से 15 मिनट पहले सीट पर वापस आ गया। पर उसने आखिरकार किट नहीं पहनी। इस तरह के कृत्यों से आखिर हम खुशहाल देश कैसे बन सकते हैं?

इन दोनों युवाओं के कृत्य निश्चित तौर पर उन्हें एक बुरा इंसान नहीं बनाते लेकिन एक समाज के तौर पर विकसित होने से हम कैसे इंकार कर रहे हैं, इस बारे में बहुत कुछ कहते हैं। कहीं न कहीं हमारे अंदर ये बात घर कर गई है कि चूंकि हम पैसे खर्च करते हैं इसलिए स्वार्थी होने का पूरा हक है। यह पूरी तरह से गलत धारणा है कि हम जो चाहें कर सकते हैं। मुझे नहीं पता कि कब हम अपने आसपास के लोगों से सहानुभूति रखना सीखेंगे, कम से कम सार्वजनिक जगहों पर ही सही। अपनी सुविधा के लिए ऐसी चीज़ों पर ज्यादा जोर देना तब समस्या बनने लगता है जब ये पूरे समाज में फैलने लगती हैं जैसे ऊपर के उदाहरण में एयरपोर्ट पर उस महिला ने और विमान में उस युवक ने किया।

शायद यही कारण हो सकता है कि मेरे दिल ने उन सैकड़ों जैन मुनियों को धन्यवाद कहा, जिनसे मैं सुबह मिला था क्योंकि वे हमेशा मास्क पहने रहते हैं और यहां तक कि जमीन पर चलने से पहले भी उसे पुंजनी से साफ करते हैं, ताकि छोटे से छोटा जीव भी उनके पैरों के नीचे आकर मारा ना जाए। मेरा सवाल है कि क्या हम उनकी आदतों का 10 फीसदी भी अपने सार्वजनिक जीवन में अपना सकते हैं?

फंडा यह है कि जब बात सार्वजनिक व्यवहार की हो, तो विकसित समाज बनने के लिए यह सजगता पूर्वक निर्णय लेने का समय है।

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