जरूरतों और चाहतों के बीच के अंतर को सिर्फ कॉर्पोरेट ही नहीं समझे हैं, बल्कि बुजुर्ग भी कॉर्पोरेट के रास्ते पर चल पड़े हैं

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

साल 2020 कई लोगों के लिए मुश्किल रहा है। कॉर्पोरेट से लेकर आम लोगों तक को बाधाओं का सामना करना पड़ा। लेकिन अगर इस साल को अलग नजरिए से देखें तो पाएंगे कि इसने अर्थशास्त्र के कई सबक सिखाए हैं, जिनका संबंध ‘जरूरत’ और ‘चाहत’ जैसे सामाजिक विज्ञान से है। ‘जरूरतें’ किसी की आधारभूत आवश्यकताएं होती हैं, जिनकी जिंदा रहने के लिए पूर्ति जरूरी है।

वहीं, ‘चाहतें’ ऐसा सामान या सेवाएं हैं, जिन्हें कोई व्यक्ति अपने आनंद के लिए पसंद करता है। और 2020 ने हम सभी को ‘जरूरतों’ और ‘चाहतों’ के बीच संतुलन बनाना सिखाया है। आमतौर पर इसे कॉर्पोरेट की भाषा मानते हैं, जिसे वे विज्ञापनों के जरिए ग्राहकों को लुभाने में इस्तेमाल करते हैं।

कुल मिलाकर, सभी ने सेहत का महत्व जाना, जिसे आमतौर पर हमारे भोजन से जोड़ते हैं। स्वास्थ्य पर इस सबक की शुरुआत तब हुई जब लॉकडाउन के दौरान रेस्त्रां बंद हो गए, जबकि किराना दुकान और सुपरमार्केट खुले रहे। हमने ताजा उत्पाद खरीदे और घर के खाने का आनंद लिया। बाहर से खाना खरीदकर लाना या बाहर खाने की व्यापक आदत बाधित हो गई।

कहीं न कहीं हमने समझा कि अतिरिक्त तेल, नमक, शक्कर, प्रिजरवेटिव और एमएसजी से भरा खाना अच्छा नहीं है। लोगों ने कुकिंग में प्रयोग किए और कई व्यंजन बनाए। इस दौरान कई छोटे बिजनेस फले-फूले, जो क्षेत्रीय भोजनों से परिचय कराकर हमारे आसपास के हुनर को सामने लाए और हमारी जीभ को बिना प्रिजरवेटिव वाले खाने के लिए ललचाया। घर का बना खाना खाने से हमने हल्का, ऊर्जावान और स्वस्थ भी महसूस किया।

और अच्छी सेहत के इस अहसास ने हमारा ध्यान ‘चाहत’ से हटाकर ‘जरूरत’ पर ला दिया है। इस बदलाव को हम या कई कॉर्पोरेशन ही नहीं, बल्कि केरल की 78 वर्षीय अन्नम्मा पुलिवेली भी समझ गई हैं। वे एक यूट्यूब चैनल चलाती हैं, जिसके 8.5 लाख सब्सक्राइबर हो गए हैं, वह भी एक साल में। ‘चट्‌टा-मुंडु’ (मलयालम में ईसाई महिलाओं का पारंपरिक परिधान) पहने इस महिला कि मुस्कान रोजाना हजारों सब्सक्राइबर को आकर्षित कर रही है और उनके व्यंजन व प्रस्तुतिकरण की शैली मशहूर हो रही है। उनके वीडियो में कोई स्क्रिप्ट नहीं होती, वे बस अपने तरीके से हंसते हुए, चुटकुले सुनाते हुए वीडियो बनाती हैं।

कुकिंग उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा है। अनम्मा नौ वर्ष की उम्र से खाना पका रही हैं। उन्हें अपने 8 भाई-बहनों की देखभाल के लिए स्कूल छोड़ना पड़ा, जिनमें 7 उनसे छोटे थे। शादी के बाद, 18 वर्ष की उम्र में वे पति के घर आ गईं और 11 वर्षों तक एक आश्रम के निवासियों के लिए खाना बनाती रहीं। छह बच्चों की मां अन्नम्मा शुरुआत से ही ऑर्गनिक कुकिंग करती रही हैं। दिलचस्प यह है कि वे सब्सक्राइबर्स से ‘एंटे मक्काल’ (मेरे बच्चों) कहती हैं और मानती हैं कि अब उनके 8.5 लाख बच्चे हैं।

मां और उनका बेटा बाबू स्टीफन पुलिवेली हर महीने कम से कम 15 वीडियो अपलोड करते हैं। बाबू के पास होटल मैनेजमेंट का डिप्लोमा है और वे कुवैत में काम कर चुके हैं और बाद में उन्होंने इराक में अमेरिकी आर्मी बेस कैंप में भी कुछ समय काम किया। इस तरह वे ‌विभिन्न व्यंजनों के बारे में जानते हैं। जब दर्शक किसी वैरायटी की मांग करते हैं तो उनकी मां इसे बनाने में उत्साह से कूद पड़ती हैं।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि युवा उनके गैर-पारंपरिक व्यंजन भी पसंद करते हैं। अन्नम्मा हर वीडियो अपलोड करने के बाद व्यूज की संख्या जरूर देखती हैं। लोग उन्हें दुनियाभर से फोन करते हैं और 15 वीडियो हर महीने बनाने के साथ ही वे सभी से धैर्य से बात करती हैं।

फंडा यह है कि जरूरतों और चाहतों के बीच के अंतर को सिर्फ कॉर्पोरेट ही नहीं समझे हैं, बल्कि बुजुर्ग भी कॉर्पोरेट के रास्ते पर चल पड़े हैं।

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