जरूरी नहीं कि विचार हमेशा रॉकेट साइंस हो, यह बुनियादी भी हो सकता है, जो आधारभूत समस्याओं को हल करे और बड़ी आबादी की मदद कर सके

बरसात के दिन नुक्कड़ पर खड़े होकर ठेकेदार का इंतजार करते दिहाड़ी मजदूर के लिए सड़क किनारे की गुमटी से एक चाय की प्याली भी राहत पहुंचा सकती है। लेकिन वह जानता है कि गर्म चाय उसे राहत देने से पहले उसकी जेब जला देगी क्योंकि अब चाय 2 रुपए में नहीं मिलती।

इस बात से अंजान कि बाढ़ से असम में चाय उत्पादन प्रभावित हुआ है, इसलिए अभी यह और महंगी होगी, वह सोच रहा है कि इस साल उसकी बच्ची की पढ़ाई कैसे पूरी होगी क्योंकि वह स्मार्टफोन नहीं खरीद सकता या इंटरनेट के लिए 200-300 रुपए भी नहीं दे सकता।

वह अकेला नहीं है जो सुबह की चाय त्याग रहा है बल्कि असंगठित श्रम बाजार में ऐसे कई लोग हैं जो भूख और शिक्षा के जरिए अपने बच्चे का भविष्य बेहतर बनाने के सपने के बीच पिस रहे हैं। ऐसी आबादी के लिए महाराष्ट्र के ग्रामीण सतारा जिले में विजयनगर के जिला परिषद प्राथमिक शाला के शिक्षक बालाजी जाध‌व देवदूत हैं क्योंकि वे रोजाना छात्रों को दिन में दो बार पढ़ा रहे हैं, वह भी बिना स्मार्टफोन और इंटरनेट के! रोचक बात यह है कि यहां से केवल 173 किमी दूर पुणे में बैठा कोई भी शिक्षक, सारी तकनीकी सुविधाओं के बावजूद ऐसा कोई आइडिया नहीं ला पाया जो सबसे निचले स्तर पर मौजदू लोगों, जैसे दिहाड़ी मजदूर, चरवाहे आदि की मदद कर पाए, जो बड़े अरमानों से बच्चों को जिला परिषद स्कूल भेजते हैं।

बालाजी का ‘फोन पर कहानी’ नाम का आइडिया धीरे-धीरे दूसरे गांवों में भी फैल रहा है, जिसे उन्होंने अप्रैल शुरू किया था। जब उन्हें पता चला कि स्कूल तय समय पर नहीं खुल पाएंगे तो उन्होंने एक बार में 15 छात्रों के ग्रुप फोन कॉल की शुरुआत की। छुटि्टयों के दौरान प्रयोग के तौर पर सुबह और शाम कुछ घंटों के लिए कहानी के कुछ सत्र रखे, जिनका उद्देश्य बच्चों को यह सिखाना था कि ऑडियो माध्यम से कैसे समझें कि क्या पढ़ाया जा रहा है। सुबह बच्चे कहानी सुनते और शाम को वही बालाजी को सुनाते। इससे बच्चों की सुनने और बोलने क्षमता सुधरी। बालाजी ने देखा कि लगभग सभी माता-पिता ऐसी कंपनियों के फोन नंबर इस्तेमाल कर रहे थे, जो एक बार में 15 लोगों को ऑडियो कॉल पर जोड़ने की सुविधा देती हैं। तो उन्होंने ग्रुप क्लास में छात्रों की संख्या इतनी ही रखी। उन्होंने यह भी देखा कि ज्यादातर माता-पिता 9 से 5 बजे तक काम पर जाते हैं, इसलिए बालाजी ने कॉल ऐसे समय पर रखे जब माता-पिता घर पर हों और बच्चे उनके फोन इस्तेमाल कर सकें।

इस साल की पाठ्यपुस्तकें आने के बाद इस महीने बालाजी ने छात्रों को विस्तार से पढ़ाना शुरू किया है। पाठ्यक्रम को याद रखने वाले शब्दों में बुनकर, बच्चों की रुचि बनाए रखते हुए बालाजी सफलतापूर्वक सुबह-शाम ऑडियो क्लास चला रहे हैं क्योंकि बच्चे कहानियों के सत्र से पहले ही ऑडियो कौशल में प्रशिक्षित हो चुके थे। आज बच्चे सुबह के कॉल का इंतजार करते हैं और शाम के कॉल से पहले पूरी लगन से दिया हुआ काम पूरा करते हैं। सुबह हर विषय को कहानी के स्वरूप में पढ़ाया जाता है। दिनभर छात्र इसे समझते हैं और शाम को शिक्षक के साथ अपने नोट्स साझा करते हैं।

फंडा यह है कि जरूरी नहीं आपकी खोज हमेशा कोई रॉकेट साइंस हो। यह बहुत अल्पविकसित भी हो सकती है, जो आधारभूत समस्याओं को हल करे और बड़ी आबादी की मदद कर सके।

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