जहां हम हैं वहां रहते हुए वो नहीं बन सकते, जो हम बनना चाहते हैं! इसके लिए हमें वह पहला कदम उठाना होगा

जिंंदगी बदलने में किसी की इजाजत नहीं लेती। हमारा एटीट्यूड है जो आगे की यात्रा तय करता है। यहां इसके उदाहरण हैं। पहला उदाहरण : बाबू मोरे साधारण से जिला परिषद प्राथमिक स्कूल, वो भी महाराष्ट्र के खोमारपाड़ा आदिवासी इलाके में शिक्षक हैं। वह पेशे से साधारण स्कूल शिक्षक हैं, पर उन्होंने अपने स्कूल के पास दस से ज्यादा गांवों का शिक्षक बनना तय किया! कृषि यहां का मुख्य पेशा है, चूंकि इस क्षेत्र में बारिश अच्छी होती है इसलिए अधिकांश लोग धान बोते हैं। और गैरबरसाती सीजन में हर साल दिसंबर में पलायन करके, अगली बारिश से पहले लौटने के इरादे से ईंट भट्‌टों या निर्माण स्थल पर काम करने चले जाते हैं।

बच्चे भी साथ जाते हैं, ऐसे में उनकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होती है। जब मोरे ने 2013 में स्कूल जॉइन किया, तब उन्हें स्कूल ड्रॉपआउट की समस्या साफ दिखी, वह जानते थे कि इसका समाधान फसलों के चक्रीकरण में है। पर उन्हें पता था कि अनुभवी किसानों को खेती सिखाने का विरोध होगा। तब इस 33 साल के शिक्षक ने सिखाने से पहले खुद खेती करने का निर्णय लिया। स्कूल के पास ही खाली पड़ी आधा गुंठा जमीन को दो शिक्षकों व छात्रों के साथ जोतकर उसमें सब्जियां बो दी। 2016 में उसने 35-40 पैरेंट्स की मीटिंग बुलाई और उन्हें चक्रीय फसल के फायदे बताकर राजी किया।

इससे उन्हें अच्छा पैसा मिला, इसके बाद और भी लोगों ने इसे शुरू किया। 2019-20 में स्थानीय एनजीओ अक्षरधारा फाउंडेशन की इस पर नजर पड़ी। इस संस्था ने अन्य 40 पैरेंट्स को राजी किया और 18 की फसल बुआई में मदद की। इन छह सालों में, मोरे पलायन को पूरी तरह से रोकने में कामयाब रहे हैं और 10 गांवों के 100 किसानों को चक्रीय फसल के बारे में बताकर उनकी मदद की है। आज वहां एक भी स्कूल ड्रॉपआउट नहीं है।

दूसरा उदाहरण : सोसायटी के क्लब हाउस में आकर ब्रांड्स दिखाना, ताकि शहर के दूसरे कोने में बने स्टोर तक ना जाना पड़े, यह ओल्ड फैशन हो गया है। नई चीज़ यह है कि आप बिना सिले फैबिक्र का एक टुकड़ा चुनते हैं, इसकी तस्वीर खींचकर अपलोड करते हैं और 10 मिनट के अंदर फैशन डिजाइनर ‘Fab3D’ नाम के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके शर्ट, ट्राउजर या पूरी ड्रेस को वर्चुअली आपके सामने दिखा देता है।

आईआईटी मद्रास के पूर्वछात्र और ‘ट्राय 3डी’ के सह-संस्थापक सुमंथ अलवाला ने यह सॉफ्टवेयर बनाया है। यह कपड़े या गारमेंट्स की सीधी तस्वीर को मॉडल्स सा मैनेक्विन पर ट्राय कराकर असली लगने वाली 3 डी तस्वीर में बदल देता है। यह पारंपरिक फोटोशूट में लगने वाला पैसा और समय बचा सकता है। पिछले तीन महीनों में 20 हजार से ज्यादा उत्पाद कैटलॉग, ई-कॉमर्स पोर्टल और बिक्री के लिए सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए।

तीसरा उदाहरण : एक 24 वर्षीय युवती को फोन आया। वह तैयार हुई, दो से ज्यादा बार खुद को शीशे में देखा कि कहीं जल्दबाजी में ज्यादा तो नहीं संवरी और उसी शहर के एक व्यक्ति के साथ वीडियो कॉल के लिए बैठ गई। वह असल में मैचमेकर के जरिए उसके पैरेंट्स के चुने लड़के से बात करने वाली है। पूरी तरह डिजिटल हो गया यह जोड़ी मिलान का बिल्कुल नया तरीका है। साधारण दिनों में इस तरह की मीटिंग का कोई मुद्दा नहीं होता और यह किसी कॉफी शॉप में हो रही होती। वर्चुअल मैचमेकिंग ने मैचमेकर्स का बिजनेस दोगुना कर दिया है।

फंडा यह है कि जहां हम हैं वहां रहते हुए वो नहीं बन सकते, जो हम बनना चाहते हैं! इसके लिए हमें वह पहला कदम उठाना होगा।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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