जिंदगी उतार-चढ़ाव भरा सफर है और केवल बुरे में अच्छा देखने का विश्वास ही आपको विजेता बनाता है

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘जय सीरम’। यह कम से कम आज तो अभिवादन का सर्वश्रेष्ठ तरीका है! 16 जनवरी की तारीख इतिहास में दर्ज होने को तैयार है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशभर के 3,006 टीकाकरण केंद्रों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़कर कोविड-19 टीकाकरण अभियान की शुरुआत करेंगे।

कम से कम आज से हम सभी अपने मोबाइल फोन मैसेजों को गर्व की नजर से देखेंगे (जब उनमें उन लोगों की संख्या दिखेगी, जिन्हें टीका लग चुका है)। यह नजर उस नुकसान वाली नजर (कितनी मौतें हुईं) से पूरी तरह अलग होगी, जिससे हम अब तक मोबाइल पर दुनिया देख रहे थे।

इसलिए ‘सीरम’ को ‘जय’ कहना तार्किक है, क्योंकि यह हमारे नजरिए को बदल देगा, जिससे अब हम अपनी नई दुनिया को देखेंगे। जैसे-जैसे दिन बीतेंगे, मुझे यकीन है कि कोविड-19 हमारे लिए बीते कल की बात हो जाएगा।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमने कोरोना के दिनों में कुछ सकारात्मक नहीं सीखा। जिन लोगों को विश्वास था कि बुरे दिनों में भी कुछ अच्छा है, उन्होंने काम करने के नए तरीके, किसी चीज का त्याग करना और समय से आगे रहने की योजना बनाने जैसी कई चीजें सीखीं।

आपको डांस कपल वीपी और शांता धननजयन याद हैं, जो 70 वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं और कुछ साल पहले मोबाइल फोन विज्ञापनों में दिखे थे, जिनमें वे गोवा की यात्रा पर अकेले जाते हैं और अपनी टैटू वाली फोटो समेत कई रोमांटिक तस्वीरें सोशल साइट्स पर अपलोड करते हैं? वे दरअसल अपने उम्रवर्ग के लोगों में जीवन के आनंद के लिए टेक्नोलॉजी को अपनाने का प्रचार कर रहे थे।

इस उम्र में, जब उनकी दैनिक डांस क्लास लॉकडाउन में बंद हो गईं, तब धननजयन दंपती ने दो प्रस्तुतियां तैयार कीं और ऑनलाइन माध्यम अपनाकर अपनी नई शैलियों में न सिर्फ शहर के, बल्कि दुनियाभर के छात्रों तक पहुंचे। उनके मुताबिक ऑनलाइन शिक्षण में शिक्षक को आमने-सामने की कक्षा की तुलना में थोड़ा ज्यादा काम करना पड़ता है। आज विज्ञापन वाले ये दंपती ऑनलाइन क्लास से दुनियाभर में ज्यादा मशहूर हो गए हैं।

एक अन्य उदाहरण देखें। लॉकडाउन के दौरान वन अधिकारियों की जगह काम करने वाले सेवानिवृत्त तलाठी (पटवारी) याकूब कोठारिया ने अहमदाबाद के पास ढांढुका में रोजका गांव के लोगों के साथ मिलकर कब्रिस्तान की बंजर जमीन पर 2,000 पेड़ लगाए हैं। उन्होंने 10 लाख रुपए भी दान दिए, जिन्हें तालाब बनाने, उपकरण खरीदने और उस जगह को छोटे जंगल में बदलने में खर्च किया गया। आज किसी को कब्र पर चढ़ाने के लिए फूल खरीदने की जरूरत नहीं है। कब्रिस्तान में ही पर्याप्त फूल लगे हैं।

एक और उदाहरण सुनीता गांधी का है, जो केवल 30 घंटे में बच्चों को कुछ साक्षर बनाती हैं। सुनीता लखनऊ में शिक्षाविद् हैं और ज्यादातर स्कूल छोड़ चुके बच्चों को पिछले पांच साल से मुफ्त में पढ़ा रही हैं। उनका ‘ग्लोबल ड्रीम प्रोजेक्ट’ पूरी तरह स्वयंसेवकों से चलता है।

यह इस आसान सिद्धांत पर आधारित है कि बच्चों से पूछिए, वे क्या जानते हैं और उसके आधार पर आगे बढ़िए। सभी छात्रों के लिए एक ही तरीके की जगह,वे प्रत्येक छात्र के मुताबिक चीजें तैयार करते हैं। छोटे-छोटे टुकड़ों में तस्वीरों और ध्वनि संकेतों से हर छात्र को शब्दों को पहचानना सिखाया जाता है। टूलकिट में 30 पाठ, 60 शॉर्ट वीडियो, किताबें, अल्फाबेट कटआउट और स्टेशनरी सामग्री हैं।

मैं खुद ऐसे कुछ स्कूल और कॉलेज शिक्षकों को जानता हूं, जिन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को पूरी तरह त्याग दिया है। ‘न टीवी और न दोस्तों के वीडियो कॉल’, यह उनका नया निजी नियम बन गया है।

फंडा यह है कि जिंदगी उतार-चढ़ाव भरा सफर है और केवल बुरे में अच्छा देखने का विश्वास ही आपको विजेता बनाता है।

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