जिंदगी में तृप्ति और ठहराव जैसा कुछ नहीं होता; यह खुले कोष्ठकों की तरह है, जितना चाहें, भरते जाएं

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस मंगलवार मैं मध्य प्रदेश के मंदिरों के शहर उज्जैन से गुजर रहा था। मैंने वहां सड़क पर एक बुजुर्ग व्यक्ति (करीब 80 वर्षीय) को देखा, जिनके मुंह में नीम की दातुन थी और उनके दोनों हाथ फोन पर व्यस्त थे। वे उसमें कॉलेज के उस युवा लड़के ही तरह डूबे थे, जिसने पहला स्मार्टफोन लिया हो। मुझे जिज्ञासा हुई कि बुजुर्गों में कौन-से ब्रांड के मोबाइल चल रहे हैं, इसलिए मैंने कार रोककर उनसे एक होटल की दूरी पूछी, जिसे मैं तलाश रहा था।

उन्होंने कुछ पल सोचा, फिर थूका और मुझे अनुमानित दूरी बताई। और क्या बढ़िया दृश्य था, उनके एक हाथ में नीम की दातुन और दूसरे में महंगा फोन था। इस दृश्य ने मुझे मोबाइल इकोसिस्टम फोरम द्वारा किया गया ‘छठवां ग्लोबल स्मार्टफोन यूजर सर्वे’ याद दिला दिया, जिसके मुताबिक दुनियाभर के 58% वयस्कों के पास स्मार्टफोन है। इससे यह रेडियो, टीवी और यहां तक कि टूथब्रश से भी ज्यादा रखी जाने वाली सामग्री बन गया।

उनकी डिजिटल आदतों के बारे में और जानने के लिए मैंने पूछा, ‘क्या यह नया फोन है?’ उन्होंने कहा कि यह नौ महीने पुराना है और वे अभी भी इसके नए फीचर समझ रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘पहले मैं इसे सिर्फ बात करने के लिए इस्तेमाल करता था लेकिन समय के साथ अब इसे अच्छे से चलाने लगा हूं।’ उनकी इस बात से मुझे जुलाई 2017 का ‘चेंजिंग नीड्स एंड राइट्स ऑफ ओल्डर पीपुल इन इंडिया: अ रिव्यू’ शीर्षक का सर्वे याद आया।

गैर-सरकारी संस्थान एजवेल फाउंडेशन दिल्ली द्वारा किए गए रिव्यू के मुताबिक करीब 94% बुजुर्ग उत्तरदाता डिजिटल रूप से अनपढ़ थे। हालांकि पिछले तीन सालों में बड़ी संख्या में और लोग जुड़े होंगे, लेकिन ऐसे लोग ग्रामीण इलाकों और टिअर 2 व टिअर 3 शहरों की तुलना में ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में सीमित थे। इसलिए मुझे खुशी हुई कि तीर्थस्थल के शहर के बुजुर्ग टेक्नोलॉजी की भाषा बोल रहे थे।

मैं हैरान रह गया कि उन्हें फेसबुक के मालिकाना हक वाले वॉट्सएप की हाल ही में आई प्राइवेसी पॉलिसी की जानकारी भी थी जो उसे अपनी पैरेंट कंपनी से यूजर का डेटा साझा करने का अधिकार देती है। मैं पूछता, इससे पहले ही उन्होंने बता दिया कि ‘मेरे बेटे ने यह सब सीखने के लिए एक ऑनलाइन क्लास में मेरा दाखिला करवाया है।’

जी हां, बेंगलुरु का संस्थान ‘ईज़ी है’ जैसे कई कंपनियां हैं, जो डिजिटल साक्षरता बढ़ाने के लिए वीडियो कॉल के जरिए लोगों को टेक्नोलॉजी का आसान इस्तेमाल सिखा रही है। ‘एजवेल फाउंडेशन’ जैसे संस्थान उन लोगों के बीच डिजिटल दुनिया पर स्वस्थ संवाद बढ़ा रहे हैं, जो कम्प्यूटर और मोबाइल फोन के साथ बड़े नहीं हुए।

उन्हें अलविदा कहने से पहले मैंने उनसे उनकी ब्रशिंग की आदत पर मजाक करना चाहा और पूछा, ‘आप टेक्नोलॉजी के बारे में इतना जानते हैं, फिर दातुन क्यों?’ और उनके जवाब ने मुझे निरुत्तर कर दिया। उन्होंने कहा, ‘बाजार में कई टूथपेस्ट दावा करते हैं कि वे दांत सफेद कर देंगे। उन्हें बनाने की सामग्री की सूची में नीम जरूर होता है।

नीम दांतों का पीलापन हटाकर उन्हें सफेद बनाता है।’ और उन्होंने मुस्कुराते हुए दांत दिखाए। कभी स्कूल शिक्षक रहे इन ‘उम्रदराज छात्र’ ने कितनी अच्छी बात कही। मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग और सोशल मीडिया के असर के बीच भविष्य में सीखने का उम्र से कोई संबंध नहीं होगा। बस कक्षाओं तक उनकी पहुंच होनी चाहिए।

फंडा यह है कि जीवन में तृप्ति जैसी कोई चीज नहीं है, बस तृप्त मन होते हैं और जिंदगी में कोई निष्क्रियता नहीं होती, बस निष्क्रिय लोग होते हैं। जिंदगी तो खुले कोष्ठकों की तरह है, इनके बीच जितना चाहें, भरते जाएं।

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