जीवन कीमती है और हमें उसका ज्यादा से ज्यादा ख्याल रखना चाहिए क्योंकि ज़िंदगी है तो सब कुछ है

जैसे किसी भी बच्चे को ज़िंदगी में अपना पहला कदम उठाने में परेशानी होती है, उन्हें भी हुई होगी, लेकिन उनके आसापास के सभी लोगों, उनके माता-पिता और चार बड़े भाई-बहनों को तब वह लड़खड़ाता कदम देख खुशी हुई होगी। लेकिन यह 1961 के मध्य की बात है, जब वे 10 या 11 महीने के रहे होंगे। लेकिन 2 नवंबर 2020 को, जब वे 60 साल के हो गए, उनके डॉक्टरों ने देखा कि उन्हें चलने में परेशानी हो रही है। न सिर्फ डॉक्टर दु:खी हुए, बल्कि उन्हें खुद भी बुरा लगा कि वे अच्छे से नहीं चल पा रहे।

उन्हें बुरा लगा क्योंकि इतने दशकों में उनके पैरों में कभी परेशानी नहीं हुई। उनके पैर किसी भी देश में बनी, किसी भी फुटबॉल के ‘महाकमांडर’ थे। फुटबॉल जैसे उनका हुकुम मानती थीं। उनके पैर, उनके बीच के चौंकाने वाले पास की मदद से बड़ी गेंद को मानो छुपाए रहते थे, वह भी काफी वक्त के लिए, जिससे प्रतिद्वंद्वी चकरा जाता था। और फिर उनका घातक शॉट कुछ इस तरह नेट पर जाता था, जैसे टीवी पर कोई खलनायक निर्दयता से छुरा मार रहा हो। यह देख उनके प्रतिद्वंद्वी सिर्फ दु:खी हो पाते थे और अर्जेंटीना जश्न मनाता था। अगर मुझे फुटबॉल से इश्क हुआ, तो इसी आदमी की वजह से।

उनकी कहानी खेल की दुनिया की रंक से राजा बनने की सबसे मशहूर कहानी है। डिएगो माराडोना एक फैक्टरी वर्कर के आठ बच्चों में पांचवी औलाद थे। युवा डिएगो को फुटबॉल गरीबी से निकलने का बेहतरीन जरिया लगता था। बतौर टीनएजर माराडोना ने अर्जेंटीना की 1979 का फीफा वर्ल्ड यूथ चैम्पियनशिप जीतने में मदद की। उन्होंने 1982 में वर्ल्ड कप में डेब्यू किया। उन्होंने मेक्सिको में 1986 के वर्ल्ड कप क्वार्टर फाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध जो गोल किया था, वह अब भी महानतम गोल्स में शुमार है।

माराडोना ने गोल मारने से पहले इंग्लैंड की लगभग आधी टीम को छकाते हुए पीछे छोड़ दिया था। उस गोल की दुनियाभर में चर्चा रही। बाद में फीफा के एक पोल में उसे ‘सदी का गोल’ चुना गया। उसी मैच में माराडोना ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल के सबसे शरारती ‘गोल’ भी किए थे। रिप्ले बताते हैं कि इंग्लैंड के गोलकीपर को पार करने से पहले बॉल माराडोना के हाथ में लगी थी लेकिन गोल अर्जेंटीना को दिया गया। इसे बाद में ‘हैंड ऑफ गॉड’ गोल कहा गया। माराडोना ने अर्जेंटीना के लिए कप जीतकर 1986 का वर्ल्ड कप अपना बना लिया। वर्ल्ड कप के इतिहास में कोई भी खिलाड़ी वैसा दबदबा नहीं बना पाया जैसा माराडोना ने मेक्सिको 1986 में बनाया।

लेकिन 1990 में उनका जादू नहीं चला और टीम जर्मनी से फाइनल में हार गई। माराडोना का 1991 में कोकीन टेस्ट पॉजीटिव आया और उन्हें 15 महीनों का निलंबन मिला। फरवरी 1994 में अमेरिका में हुए वर्ल्डकप में उनका ड्रग टेस्ट पॉजीटिव आया और फीफा ने उन्हें वर्ल्डकप से निकाल दिया। रिटायरमेंट के बाद, माराडोना की सेहत शराब और ड्रग्स की वजह से बिगड़ने लगी। उन्होंने सेहत को मिले कई झटकों के बाद 2010 वर्ल्डकप में बतौर अर्जेंटीना कोच वापसी की जहां लिओनेल मेस्सी जैसा उभरता सितारा भी था।

लेकिन बुधवार को उनके निधन ने फुटबॉल की दुनिया को चौंका दिया। और मेरी उनसे एक शिकायत है। अगर उन्होंने अपनी सेहत का ख्याल रखा होता, तो मेरे जैसे फैन्स को अब भी उन्हें किसी अन्य भूमिका में मैदान पर देखने का आनंद मिलता।

फंडा यह है कि जीवन कीमती है और हमें उसका ज्यादा से ज्यादा ख्याल रखना चाहिए क्योंकि ज़िंदगी है तो सब कुछ है।-एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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