अगर आप चाहते हैं कि दुनिया आपको हमेशा याद रखे, तो यह सुनिश्चित करें कि आपके पास जीवन में एक ऐसा विश्वास जरूर हो, जिसे ध्यान में रखकर आप सारे कार्य करें

Management Funda By N. Raghuraman

ये होटलवाले मानते थे कि ‘खाना बेचना पाप है’! होटल चलाने वाला होने के बावजूद उन्होंने कभी कमरे नहीं बेचे, क्योंकि थे ही नहीं। लेकिन अपने और परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्हें खाना बेचना पड़ता था। लेकिन जब भी वे खाना बेचते, तो उन्हें लगता कि वे पाप इकट्‌ठा कर रहे हैं क्योंकि उनके पिता ऐसा कहते थे। इसीलिए उन्होंने पाप का बोझ कम करने का तरीका निकाला। इससे उन्हें लगता था कि चित्रगुप्त के साथ हिसाब में मदद मिलेगी, जो हमारे पुराणों के मुताबिक जीवन की बैलेंस शीट बनाने वाले चीफ़ एकाउंटेंट हैं।

इस मंगलवार रात, के. नारायणस्वामी उर्फ चंदन की हार्टअटैक से मृत्यु हो गई। वे मुंबई के प्रतिष्ठित दक्षिण भारतीय रेस्त्रां ‘मणीज़ लंच होम’ के मालिक थे। अगर आप उनके पिता के नाम पर बने इस छोटे रेस्त्रां के सामने से गुजरेंगे तो सांबर, फिल्टर कॉफी और अन्य दक्षिण भारतीय व्यंजनों की खुशबू आपको खींच लेगी। लेकिन सांबर उनकी खासियत थी। जिस तरह आज स्टारबक्स और कैफे कॉफी डे, कॉफी की खुशबू से आकर्षित करते हैं, उसी तरह गुजरने वालों को खुशबू से आकर्षित करने की कला चंदन ने दशकों पहले सीख ली थी। यानी जब ये देशी-विदेशी ब्रांड जन्मे भी नहीं थे, तब चंदन ये कला जानते थे। जैसे आज की पीढ़ी कहती है, ‘चलो सीसीडी या स्टारबक्स पर मिलते हैं’, वैसे ही अपने लड़कपन के दिनों में हमारी भी मिलने की जगह थी, जिसे हम ‘मणि’ कहते थे। उस समय वहां मिलने का कारण आज की पीढ़ी जैसा नहीं था। हमारे पास पैसे नहीं होते थे और जो भी पैसा बचता था, उससे पेट भरने के लिए हम ‘मणि’ ही जाते थे।

ऐसा इसलिए क्योंकि वे न सिर्फ हर नाश्ते के ऑर्डर के साथ मुफ्त सांबर और चटनी देते थे, बल्कि आप जितना चाहें, उतना सांबर-चटनी ले सकते थे। जब हम युवा उनके छोटे से रेस्त्रां में घुसते, वे समझ जाते कि हम उनकी सांबर की बाल्टी लूट लेंगे। वे धीरे से रसोई में चले जाते। कभी-कभी हम सोचते थे कि वे सांबर में गरम पानी मिला देंगे। लेकिन हम गलत थे। वे दरअसल यह सुनिश्चित करने जाते थे कि सांबर में धनिया और हींग की जबरदस्त खुशबू आए और शेफ से चटनी में और नारियल डालने को कहते थे। दरअसल मेरे एक दोस्त से उन्होंने कहा भी था, ‘ये युवा गरीब हैं, संघर्षरत हैं, लेकिन ईमानदार हैं। अगर हम खाने की गुणवत्ता में उन्हें धोखा देंगे तो वे समाज को धोखा देने के बारे में सोचेंगे। जैसे हम साल-दर-साल आर्थिक रूप से मजबूत होते गए, ये युवा भी सफल होंगे। वहां पहुंचने के लिए हमें उन्हें खाना देना होगा। यही एक तरीका है जिससे मैं खाना बेचने के अपने पाप को कम कर सकता हूं।’

चूंकि हर दक्षिण भारतीय त्योहार (जो ढेर सारे हैं) पर हम अपने गृहनगर नहीं जा सकते थे, इसलिए तब वे मेन्यू थोड़ा बदलकर उसमें सामान्य इडली, मेदू वड़ा, मैसूर बोंडा और डोसा की जगह कुछ त्योहारी व्यंजन जोड़ देते। नियमित आने वालों के लिए, नए ग्राहकों से छिपकर मिठाई दो बार परोसी जाती, यह कहते हुए कि ‘तुम्हें मां के हाथ का खाना याद आ रहा होगा।’ एक पल के लिए वे सभी की आंखों के सामने उनकी मां के चेहरे लाकर, उन्हें भावुक कर देते थे। यह अहसास वे ही समझ सकते हैं जिन्होंने माता-पिता से दूर अकेले रहकर जीवन जिया है।

चंदन की तरह, हम सभी को भी अपने जीवन में एक विश्वास लाने और उसे ध्यान में रखकर कार्य करने की जरूरत है क्योंकि इससे हमारा अंतिम प्रॉफिट (पढ़ें पुण्य) संभल जाता है और जीवन की बैलेंस शीट चमक उठती है।

ये होटलवाले मानते थे कि ‘खाना बेचना पाप है’! होटल चलाने वाला होने के बावजूद उन्होंने कभी कमरे नहीं बेचे, क्योंकि थे ही नहीं। लेकिन अपने और परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्हें खाना बेचना पड़ता था। लेकिन जब भी वे खाना बेचते, तो उन्हें लगता कि वे पाप इकट्‌ठा कर रहे हैं क्योंकि उनके पिता ऐसा कहते थे। इसीलिए उन्होंने पाप का बोझ कम करने का तरीका निकाला। इससे उन्हें लगता था कि चित्रगुप्त के साथ हिसाब में मदद मिलेगी, जो हमारे पुराणों के मुताबिक जीवन की बैलेंस शीट बनाने वाले चीफ़ एकाउंटेंट हैं। इस मंगलवार रात, के. नारायणस्वामी उर्फ चंदन की हार्टअटैक से मृत्यु हो गई। वे मुंबई के प्रतिष्ठित दक्षिण भारतीय रेस्त्रां ‘मणीज़ लंच होम’ के मालिक थे। अगर आप उनके पिता के नाम पर बने इस छोटे रेस्त्रां के सामने से गुजरेंगे तो सांबर, फिल्टर कॉफी और अन्य दक्षिण भारतीय व्यंजनों की खुशबू आपको खींच लेगी। लेकिन सांबर उनकी खासियत थी। जिस तरह आज स्टारबक्स और कैफे कॉफी डे, कॉफी की खुशबू से आकर्षित करते हैं, उसी तरह गुजरने वालों को खुशबू से आकर्षित करने की कला चंदन ने दशकों पहले सीख ली थी। यानी जब ये देशी-विदेशी ब्रांड जन्मे भी नहीं थे, तब चंदन ये कला जानते थे। जैसे आज की पीढ़ी कहती है, ‘चलो सीसीडी या स्टारबक्स पर मिलते हैं’, वैसे ही अपने लड़कपन के दिनों में हमारी भी मिलने की जगह थी, जिसे हम ‘मणि’ कहते थे। उस समय वहां मिलने का कारण आज की पीढ़ी जैसा नहीं था। हमारे पास पैसे नहीं होते थे और जो भी पैसा बचता था, उससे पेट भरने के लिए हम ‘मणि’ ही जाते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि वे न सिर्फ हर नाश्ते के ऑर्डर के साथ मुफ्त सांबर और चटनी देते थे, बल्कि आप जितना चाहें, उतना सांबर-चटनी ले सकते थे। जब हम युवा उनके छोटे से रेस्त्रां में घुसते, वे समझ जाते कि हम उनकी सांबर की बाल्टी लूट लेंगे। वे धीरे से रसोई में चले जाते। कभी-कभी हम सोचते थे कि वे सांबर में गरम पानी मिला देंगे। लेकिन हम गलत थे। वे दरअसल यह सुनिश्चित करने जाते थे कि सांबर में धनिया और हींग की जबरदस्त खुशबू आए और शेफ से चटनी में और नारियल डालने को कहते थे। दरअसल मेरे एक दोस्त से उन्होंने कहा भी था, ‘ये युवा गरीब हैं, संघर्षरत हैं, लेकिन ईमानदार हैं। अगर हम खाने की गुणवत्ता में उन्हें धोखा देंगे तो वे समाज को धोखा देने के बारे में सोचेंगे। जैसे हम साल-दर-साल आर्थिक रूप से मजबूत होते गए, ये युवा भी सफल होंगे। वहां पहुंचने के लिए हमें उन्हें खाना देना होगा। यही एक तरीका है जिससे मैं खाना बेचने के अपने पाप को कम कर सकता हूं।’

चूंकि हर दक्षिण भारतीय त्योहार (जो ढेर सारे हैं) पर हम अपने गृहनगर नहीं जा सकते थे, इसलिए तब वे मेन्यू थोड़ा बदलकर उसमें सामान्य इडली, मेदू वड़ा, मैसूर बोंडा और डोसा की जगह कुछ त्योहारी व्यंजन जोड़ देते। नियमित आने वालों के लिए, नए ग्राहकों से छिपकर मिठाई दो बार परोसी जाती, यह कहते हुए कि ‘तुम्हें मां के हाथ का खाना याद आ रहा होगा।’ एक पल के लिए वे सभी की आंखों के सामने उनकी मां के चेहरे लाकर, उन्हें भावुक कर देते थे। यह अहसास वे ही समझ सकते हैं जिन्होंने माता-पिता से दूर अकेले रहकर जीवन जिया है।

चंदन की तरह, हम सभी को भी अपने जीवन में एक विश्वास लाने और उसे ध्यान में रखकर कार्य करने की जरूरत है क्योंकि इससे हमारा अंतिम प्रॉफिट (पढ़ें पुण्य) संभल जाता है और जीवन की बैलेंस शीट चमक उठती है।

फंडा यह है कि अगर आप चाहते हैं कि दुनिया आपको हमेशा याद रखे, तो यह सुनिश्चित करें कि आपके पास जीवन में एक ऐसा विश्वास जरूर हो, जिसे ध्यान में रखकर आप सारे कार्य करें।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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